शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

"राम का अन्तर्द्वन्द "

       मैं ,तथाकथित मर्यादा पुरुषोत्तम राम ,आज जब सब से हट कर खुद 
की नजरों से अपना आकलन करता हूँ , तो मन सच  में  ही भटकने लगता 
है |  इन मर्यादाओं  के पालन में  मुझ से क्या कुछ  छूटता गया  और एक 
बंधन में मै बंधता गया खुद को प्रमाणित करने की, एक आदर्श बनाने की |
       जब अपना बचपन याद करता हूँ  तो सामने माँ  की तस्वीर आ जाती 
है | मेरी माँ - महारानी कौशल्या - का अभिशप्त जीवन जो वो अपनी अन्य 
सपत्नियो कैकेयी और सुमित्रा के साथ बांटने को मजबूर थी झूठे  स्वीकार 
के अभिनय के साथ |मेरी दूसरी माता कैकेयी महारानी का वैभव जीती थी 
और भरत  युवराज  का ! शायद उस पल से  ही माँ की वंचनाओ का  बोझ 
ढ़ोता मै आदर्श बनने  की धुन में लग गया और एक  सामान्य जीवन न 
जी पाया | जब वनवास जाने का समय आया तब भी अपनी माँ को एक आदर्श बेटे की माँ होने का  गर्व देने के लिए स्वेच्छा से वन चला गया |
         अनेक ऐसी छोटी - छोटी घटनाये होती रही और मै मर्यादा पुरुष का 
आकार लेता गया | इस प्रक्रिया में सीता निरंतर  उपेक्षित  होती  रही  और
इसकी हद तो तब पार हो गयी जब  मैंने  उनका त्याग किया , वो  भी एक 
 धोबी के मामूली से  उपहास पर ! मैंने अपने इस मर्यादित जीवन में ये एक 
इतना बड़ा पाप किया , अपनी सहधर्मिणी जो गर्भवती थी और सम्पूर्ण रूप 
से मुझ पर  ही आश्रित थी , को राज्य  से  निकाल दिया एक कठिन जीवन
जीने के लिए ! यज्ञ में तो सीता की स्वर्ण  - प्रतिमा  प्रतिष्ठित कर  दी  पर 
जीवंत  अर्धांगिनी को उपेक्षित ही किया !
       अगर मै इतना आदर्श बनाने का प्रयास न करता तब भी शायद अपने
राज्य ,समाज और अपने आश्रितों का  पालन अच्छी तरह से ही करता,बिना 
किसी  भी  प्रकार की  ग्लानि के | अगर  किसी  भी स्त्री  को  उसके  घर से निकाल दिया जाता हो तो उस राज्य को और कुछ भी कह ले किन्तु किसी 
भी हालत में " रामराज्य "  कभी भी नहीं कहा जा सकता है ! 
    
   

7 टिप्‍पणियां:

  1. अंतर्द्वंद तो सही विषय पे है...निजी जीवन तो राम ने जिया ही नहीं...

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  2. आपका कहना सही है ..स्त्री को उपेक्षित कर समाज का क्या भला किया जा सकता है ...

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  3. रामकथा को देखने का नया दृष्टिकोण।

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