रविवार, 20 फ़रवरी 2011

"मैक्डी से मैक्डी तक "

    सबके जीवन में सबसे महत्वपूर्ण अक्षर " म " है | बच्चा जब बोलना शुरू 
करता है तब सबसे  पहला अक्षर  उसके  मुख से " म " ही  निकलता  है | ये इतना बहुअर्थी होता है की हर व्यक्ति अपने अनुसार उसका अर्थ निकाल कर 
खुश हो जाता है | उस बच्चे की जननी खुशी से झूम उठती है और सोचती है कि उसको " माँ " की  पहचान मिल गयी | माँ  का  भाई सोचता है  बच्चे  ने  मामा कह कर अपने मातृपक्ष को वरीयता दी है |घर  के  अन्य  बच्चे  अन्य सबकी धारणाओं को एकदम से  वीटो लगा  कर  नकार  देते हैं |  नन्ही  सी 
बाल - संसद के मतानुसार तो बच्चे ने तो "माऊं" अर्थात बिल्ली को पुकारा
 है | हो गयी न सबके मन की और इस सारे विवाद का  मूल स्रोत वो बच्चा 
मस्ती से अपने पालने में मीठे सपनों में खो जाता है |
        जब बच्चा थोड़ा और बोलने लगता है तो नित नयी फ़रमाइशे शुरू हो जाती हैं | माँ ,मामा ,चन्दा मामा ,मम्मम से भी दो - चार क़दम आगे  बढ़
चलता है | इन सब में एक नया शब्द शामिल हो जाता है "मैक्डी" का और 
बाकी के सारे "म " भूल जाता है | इस मैक्डी से नए - नए बने माता - पिता
बेहद खुश हो जाते हैं | बच्चे की हर कामयाबी और  खुशियों  पर  सीधे  इस
मैक्डी नामधारी तीर्थ में पहुँच जाते हैं | अभी भी नहीं समझ पाए ! अरे भई
यह मैक्डी और कुछ  नहीं आपका जाना - पहचाना "मैक्डोनाल्ड "रेस्त्रां है | 
सच पूछिए तो इस मैक्डी से अपनी कोई नाराज़गी है नहीं | धीरे- धीरे बच्चे
इस तीर्थ  पर अपनी  मित्र - मंडली के साथ जाना कुछ अधिक पसंद करने लगते हैं | हम भी आधुनिक अभिभावक  होने की  सनद पाने की  चाह  में 
उन के मैक्डी जाने को स्वीकार कर लेते हैं |
                  अब  बच्चे जब भी जाते हैं वे  यही कहते हैं कि मैक्डी जा रहे हैं | परन्तु अब  वो "मैक्डोनाल्ड" नहीं बल्कि "मैक्डोवेल "जा रहे होते हैं | इन दोनों मैक्डी में ज़मीन और आसमान  का अंतर होता है | चलिए इस अंतर को भी हम ही बता देते हैं और आपके ज्ञान-चक्षु भी खोलने का पुण्य भी बटोरे लेते हैं | मैक्डोनाल्ड से बच्चे उछलते-कूदते होश में ही निकलते हैं जबकि  मैक्डोवेल  से लड़खड़ाते क़दमों से लुढ़कते हुए आते हैं और होश 
तो सिलेबस में होता ही नहीं |
          अब जब भी बच्चा बोले "मैक्डी " जाने को तो पूछ जरूर लीजिये कि
कौन से मैक्डी में जाना है !       

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