सोमवार, 23 मई 2011

"प्रतिशोध" या "प्रारब्ध"....................


इस दावानल में अग्नि की इन दाहक लपटों से घिरी हुई मैं, अपने अंतिम आसन पर बैठी हूँ !पर सच कहूँ, मुझे तो मंद ,सुरभित ,सुगन्धित ,मलयानिल के मदमस्त झोंकों से घिरी किसी स्वर्गिक उपवन में होने की सी शीतलता मिल रही है | आप को शायद ये अविश्वसनीय लग रहा हो, पर जब अंतरात्मा तक प्रतिशोध की दाहकता से सुलग रही हो ,तब कैसी भी अग्नि जो प्रतिशोध की पूर्णता का आभास कराये, शीतल ही लगती है |आज मैं (एक तथाकथित अबला) एक शक्तिशाली साम्राज्य से अपनी अस्मिता के कुचल दिए जाने का बदला ले पाने में सफल हुई हूँ |
 जब भी अपना पिछ्ला जीवन या कहूँ अपना बचपन याद करती हूँ तो सिर्फ एक चहकती -फुदकती नन्ही सी चिड़िया याद आती है, जो अपनी छोटी सी दुनिया में कलरव करती मग्न रहती है | मैं भी अपने माता -पिता के पास गांधार में सुख के हिंडोलों में झूल रही थी |शिव-भक्ति में लीन मैं जब तक कुछ समझ पाती, एक अहेरी सदृश हस्तिनापुर के युग-पुरुष भीष्म ने अपनी सैन्य शक्ति के बल पर अपने दृष्टिहीन भतीजे धॄतराष्ट्र के संग विवाह-बंधन में जकड़ दिया |एक निर्बल राष्ट्र के अधिपति मेरे पिता राष्ट्र के हित में बंधे मेरे पक्ष में कुछ भी न कर सके और मेरे रंगों भरे चमकते जीवन में एक घना अन्धकार छा गया |
अपनी सास-द्वय अम्बिका और अंबालिका के विरक्ति भरे नियोग के परिणाम -दृष्टिविहीन धृतराष्ट्र और चिर रोगी पाण्डु -से सहम कर ,मैंने ऐसी किसी भी स्थिति को टालने के लिए अपने नेत्रों पर पट्टी बाँध ली | सब ने इसको भी मेरे पतिव्रत धर्म की पराकाष्ठा मानी और मुझे महिमा-मंडित किया ,पर सत्यता तो इस से अलग ही थी |ये तो एक निर्बल नारी का प्रतिकार था ,जो कब कैसे अनायास ही ऐसे प्रतिशोध  में परिवर्तित हो गया  ,पता ही नहीं चला | अपनी अस्मिता ,अपना मान गवाँ कर भी मुझे अपने पति का एकनिष्ठ साथ नहीं मिला |मेरे अतिरिक्त भी मेरे नेत्रहीन पति की नौ अन्य रानियाँ भी थीं |
हमारे शत-पुत्र ,शारीरिक रूप से स्वस्थ होते हुए भी मानसिक विकृति का शिकार थे |सबके प्रति कलुष से भरे ,हर श्रेष्ठ पर अपना ही एकाधिकार समझने वाले बन गए थे,शायद ये मेरे अंतर्मन की कुढ़न का ही दुष्परिणाम था |अनजाने में ही अपने पुत्रों को मैंने भीष्म विरोधी बना दिया ,जो हस्तिनापुर के साथ ही उनके लिए भी घातक हुआ |
मैंने अंतत:हस्तिनापुर ,जिसने मेरे जीवन को अंधकूप बना दिया था ,से प्रतिशोध ले लिया |इस पूरी प्रक्रिया में घायल मैं ही ज्यादा हुई |अपने इतने शक्तिसंपन्न पुत्रों और जामाता की मृत्यु का कारण अनजाने में बन गयी | पाण्डु-पुत्रों और कुंती के प्रति अपने बच्चों की प्रगल्भता पर मैं संतप्त भी हुई हूँ |सम्पूर्ण राज-भवन में कुंती सी संतुलित नारी कोई अन्य नहीं मिली जो सब के प्रति समभाव से स्नेह का निर्झर बहाती थी |मैंने अपनी कई मौतों की पीड़ा भी झेली है |जब-जब द्रौपदी हमारे बच्चों की कुटिलता का शिकार हुई है मैं ने भी उस के साथ ही मरणान्तक पीड़ा भोगी है ,क्योंकि ये वही द्रौपदी थी जिसने हमारे दुर्योधन को भी 'सुयोधन'ही पुकारा और दु:शला भी उसके लिए 'सुशीला' थी |इस को विडम्बना ही कहूंगी कि द्रौपदी और पांडवों के दुर्भाग्य का कारण मेरे कलुष से पालित दुर्योधन था |मेरी दु:शला का पति जयद्रथ ही द्रौपदी के मान भंग के प्रयास का दोषी था |अभिमन्यु के वध में भी अंतिम प्रहार करने वाला भी मेरा जामाता ही था |इतना सब होते हुए भी ,अपने वंश के विनाश का कारण होते हुए भी ,मेरा मन मुझे गलत नहीं मानता क्योंकि माँ के मन को सुख पाने की उम्मीद उसके बच्चों से ही होती है और जब इतनी समर्थ संतान हों तो ये चाहत और भी बढ़ जाती है |
इतने विशाल सत्तासंपन्न राज्य के विनाश के बाद भी ,मेरी अंतरात्मा भीष्म को अभी भी माफ़ नहीं कर पा रही, क्यों कि उन्होंने मुझ को मिले रूद्र के ,शतपुत्रवती  होने के ,वरदान को ही आधार मान कर मेरे जीवन को अंधकारमय बना दिया |अगर मैं किसी के प्रति स्वयं को अपराधी पाती हूँ, तो वो हमारे राजकुल की पुत्रवधुएँ हैं, जिन्हें असमय वैधव्य का सामना करना पड़ा |क्या अब भी मुझ को अपना नाम बताने की आवश्यकता है ?चलिए मैं बता ही देती हूँ --मैं हूँ गांधारी -गांधार राज्य की राज पुत्री ,हस्तिनापुर की महारानी ,धृतराष्ट्र की पत्नी ,दुर्योधन की माँ  ,द्रौपदी-भानुमती जैसी सुशीला नारियों की सास ,अभिमन्यु और लक्ष्मण सरीखे वीरों की दादी और एक प्रवंचिता नारी ...........
 अब सोचती हूँ कि ये मेरा प्रतिशोध था या प्रारब्ध !!            .     

15 टिप्‍पणियां:

  1. सफल आलेख... विस्तृत अध्ययन , पढकर कुछ अधिक जाना

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  2. इन व्यक्तित्वों पर विचार ऐसे न जाने कितने प्रश्नों को जन्म दे जाता है।

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  3. सार्थक लेख..... ये वो चरित्र हैं जिनकी उपेक्षा हुई इतिहास में ... लेकिन इन्होने इतिहास पर गहरा प्रभाव डाला...

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  4. गांधारी का चरित्र सोचने पर विवश करता है कई बार ...उसकी आँखों पर पट्टी प्रेम था या तिरस्कार या प्रतिरोध ..
    गहन चिंतन को उत्सुक करती श्रेष्ठ रचना !

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  5. आप नींव की ईंटों पर भी नज़र रखती है...यहाँ आना भी अच्छा लगा...

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  6. नेत्रों की मौजूदगी में नेत्रहीनता का जीवन व्यतीत करती गांधारी के अन्तर्मन की पीडा का गहन चित्रण...

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  7. निवेदिता जी बहुत अच्छा लगा पढ़ कर ..सच ही बहुत से प्रश्न उठते हैं मन में ...

    यदि वक्त हो तो यहाँ भी पढियेगा

    सच बताना गांधारी

    --

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  8. फुर्सत मिले तो 'आदत.. मुस्कुराने की' पर आकर नयी पोस्ट ज़रूर पढ़े .........धन्यवाद |

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