सोमवार, 9 मई 2011

मां........

बहुत दिनों पहले एक कहानी पढ़ी थी ,जिस में बच्चों ने अपनी माँ का जन्मदिन मनाया था | उस कहानी में माँ पूरे दिन बच्चों की फरमाइशें पूरी करती रह जाती है और रात में बच्चे खुश हो कर सो जाते हैं कि उन्होंने अपनी माँ का जन्मदिन बहुत अच्छे से मनाया और माँ खुश हो गयी |जब ये पढ़ा था तब उन बच्चों पर तरस और कुछ अंशों में आक्रोश भी हुआ था कि माँ तो पूरे दिन और भी ज्यादा व्यस्त रही ,थक भी गयी | रात में सबके सो जाने पर भी काम ही करती रही...........
पर अब जब तकरीबन ८-१० दिनों से मदर्स-डे की धूम सुन रही हूँ और खुद भी माँ बन गयी हूँ तो उस माँ के सुकून को महसूस कर पा रही हूँ ,जो बच्चों के सुख में ही खुश हो लेती है |आज अपनी माँ के बारे में सोचती हूँ तो लगता है कि आज अगर वो सशरीर साथमें होती तो शायद अपनी बातें उनसे कह पाती और उनको कुछ समझ पाती ....अब उनके देहांत के बाद ऐसा शून्य छा गया है जो अपूरणीय है |

बेहद सरल और सीधी थीं हमारी माँ |नाराज़ होना तो उनको आता ही नहीं था |हम सारे भाई-बहन (उन्हें कजन्स नहीं कह सकती क्यों कि माँ ने ऐसा कहने ही नहीं दिया)चाहे जितनी शैतानी या कहूं ऊधम कर लें माँ के चेहरे से उनकी मुस्कान कभी ओझल नहीं हो पाती थी |हमारी बड़ी भाभी कभी गुस्सा दिखाती तो माँ हमेशा कहती कि अगर बच्चे शरारतें नहीं करेंगे तो उनका बचपन कैसा !हमारे ताऊजी और ताईजी का शरीरांत जब हुआ पापा पढ़ रहे थे | ताऊ जी के दोनो बच्चे-दीदी और भैया- हमारे पापा और माँ को चाचाजी और चाचीजी कहते थे | माँ ने हम सब से भी पापा को चाचाजी ही कहलवाया कि भैया और दीदी को पराया न लगे |मेरे जन्म के बाद दीदी ने ही मुझसे पापा को पापा कहलवाना शुरू किया |माँ के ऐतराज़ करने पर वो भी माँ-पापा कहने लगी | जब रिश्तों में स्वार्थ दिखता है तब माँ बेहद याद आती हैं ........
जब बहुओं को जलाने और सताने का सुनती हूँ ,तब माँ याद आती हैं जो अपनी बहुओं की लिए कवच सरीखी थी  कोई भी भाभियों को कुछ नहीं कह सकता था |वो हमेशा कहती थीं दूसरे परिवार से आयी हैं इस परिवार की रीति-नीति सीखने में समय लगेगा ही और वो समय उनको देना चाहिए |जब एक सी गलती करने पर मुझको टोकतीं थीं और भाभियों को कुछ नहीं कहती थीं तब मुझे भी माँ गलत लगतीं थीं |मेरी भाभियों के भी आपत्ति करने पर कहतीं थी कि पता नहीं कैसा परिवेश मिले इसलिए इसको सतर्क रखना चाहिए |आज लगता है कि वो पूर्णत:ठीक थीं |पर जब और रिश्तेदार मुझसे काम करवाने को कहते और सतर्क करते कि ऐसा न करने पर बाद में उपहास का कारण बनूंगी ,तब माँ का विश्वास कि समय पर सब सम्हाल लूंगी दृढ़ रहा और मैं भाइयों की बराबरी करते सिर्फ पढ़ती रही |
कभी कोई उनको कुछ कहता तो वो उस टकराव को हँस कर टाल जातीं थीं |हमारे विरोध करने पर वो समझातीं कि कहने वाले की समझ इतनी ही है ,अगर उसे समझ होती तो वो ऐसा न कहता |इतनी सहिष्णुता और समझ वाले संस्कार देने वाली हमारी माँ ने घर परही पढ़ाई की थी |उनके संस्कारों का ही परिणाम है कि हम भाई-बहन अपने जीवन में संतुष्ट हैं |
आज सब कुछ होने पर सिर्फ ये अफ़सोस है कि अगर ये समझ पहले आ जाती तब शायद माँ को कुछ और समझ और समय दे पाती |हर रिश्ते को सम्हालना सिखाने वाली माँ का महत्व अब उनके न रहने पर ज्यादा समझ आता है |सबसे तो कहतीं हूँ माँ को अनदेखा न करना ,क्योंकि उनके न रहने पर ये अनदेखी अंतिम श्वांस तक टीस देगी ,पर खुद क्या करूँ ये खुद को ही नहीं समझा पाती हूं  |इसी अपराध-बोध में कुछ भी लिखने की हिम्मत नहीं हो रही थी ,फिर लगा शायद फिर एक गलती हो जायेगी |जानतीं हूँ माँ तो माँ होती हैं जहाँ से भी वो देख रही होंगी वो मुझे क्षमा कर देंगी ....बस एक ही कामना है जब-जब जन्म लूँ ईश्वर मुझे मेरी यही माँ ही दे जिसने मेरे ऐसे लड़खड़ा कर चलने वाले कदमों को दृढ़ता दी और अपने आंचल की सुरक्षित छाँव तले संजोये रखा !!!
               -निवेदिता


16 टिप्‍पणियां:

  1. माँ तो बस माँ होती हैं| धन्यवाद|

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  2. आपका यह संस्मरणात्मक आलेख बहुत कुछ बयां कर देता है.

    सादर

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  3. anubhaw maa banne ke baad hi to hota hai... aur maa kaise nahin saath, unki itni achhi seekh jo hai antastal me

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  4. माँ को अनदेखा करने वाले हमेशा ही पछताते रहे हैं. ये मानवीय व्यवहार ही है कि जब उसके पास कोई चीज़ होती है तो उसका महत्त्व नहीं समझता, और जब वो चीज़ दूर चली जाती है तो उसे याद करता है. बाद में संभालना और प्रायश्चित करना भी अच्छा है.
    आपने सुंदर लिखा है. कुछ शब्दों की त्रुटियाँ हैं, कोशिश करें तो सुधर सकती हैं.
    मेरे ब्लॉग पर आने और कमेन्ट करने का बहुत-बहुत धन्यवाद.

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  5. बहुत मर्मस्पर्शी रचना..माँ तो हमेशा साथ ही रहती है, यहाँ से जाने के बाद भी यादों में ...

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  6. @एम सिंह -किन शब्दों की त्रुटियां हैं ये भी बता दें ,क्योंकि मुझे तो कोई शब्द ऐसा नहीं लग रहा है !
    @कैलाश जी ,रश्मी दी ,यशवन्त और पटाली -आप सब का धन्यवाद ..

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  7. धन्य है माँ का विस्तृत हृदय।

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  8. भावपूर्ण हृदयस्पर्शी संस्मरण...... माँ को नमन

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  9. दुनिया की हर माँ को सादर प्रणाम!........बहुत ही भावपूर्ण.....

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  10. माँ , ईश्वर का जीवित स्वरुप होती है,
    जो जब तक इस दुनियां में रही, हम अपने आपको रक्षित मानते रहे ! शुभकामनायें अच्छे लेख के लिए !

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  11. Bahut hi sundar Abhvyakti... plz visit my blog and give me ur valuable comments = http://yogeshamana.blogspot.com/

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  12. ह्रदयश्पर्सी संस्मरण...
    माँ ..माँ होती है जिसका कोई विकल्प नहीं

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  13. बहुत मर्मस्पर्शी रचना.....माँ को नमन

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