शनिवार, 1 सितंबर 2012

क्यों कहूँ मैं पीछे ..............


भला बताइए तो इस नारी मुक्ति के और नारी जागरण के समय में हम पीछे क्यों रहें ! जब देखो सब टिका जाते हैं तुम बेचारी स्त्री हो समाज तुम्हे चैन से जीने नहीं देगा ... बस मेरे पीछे ही रहो | हमारी भी कोई गलती नहीं | हम तो जीवन की पहली साँसे लेने के साथ ही परम्परावादी बन अनुसरण करते रहे | पूरी कोशिश की इतना कम पढने की ,कि विद्यालय में पीछे की कुर्सी मिले | पर  उफ़ ये सहपाठी , पता नहीं  कैसे हमसे भी कम पढ़ते और मजबूरन हमको अग्रासन मिल जाता ! खेल के मैदान में पीछे रहने का प्रयास किया तो यहाँ भी किस्मत हमसे पहले ही अट्टहास करती पहुंच गयी और हम डिफेंडर बना दिए गये !अब देखिये हमारी क्या गलती .... हमने पूरे मनोयोग से ये प्रयास किया था ,पर सफल न हो पाए   (

अगर थोड़ा और पीछे देखा जाए ,मेरा तात्पर्य है मेरे जन्म से ,तो यहाँ भी हम इंतज़ार करते रहे और अपने चारों भाईयों के बाद प्रगट हुए | पर यहाँ भी भाईयों ने दुलार - दुलार में सबसे आगे रखा  -:) कोई कुछ भी कह ले बात तो हमारी ही मानी जानी थी | कैशौर्यावस्था में आते ही फिर सलाहकारों ने हमारी माँ की घेराबंदी की " अब तो कुछ सिखा दो | दूसरे घर जायेगी परिवार की नाक कटा देगी | " वगैरा - वगैरा .....

अब जब शादी निश्चित हुई तब हमने भी सोचा थोड़ा शालीन बनने की ट्रेनिंग ली जाए | पर हाय रे देश का दुर्भाग्य ! ऐसे किसी ट्रेनिंग कैम्प का पता चल पाने के पहले ही शादी की तिथि द्वारे खडी शहनाई बजाने लगी  -:)  भाभियों ने समझाया " थोड़ा चुप रहना और हमारे इशारे को देखना | " मंडप में बाकायदा नाउन को समझाया गया कि वो हमारे सर को नीचे की तरफ दबाए रखे | मंडप में जैसे ही फेरे पड़ने शुरू हुए हमने पतिदेव को अपने साथ बंधने की चेतावनी देने के लिए ,बाकायदा गठ्बन्धन के दुपट्टे को थोड़ा सा झटका भी दिया और उनकी तीव्र गति को नियंत्रित करने का प्रयास किया | अब बदनाम तो बेचारी मैं ही होऊँगी पर क्या करती चार फेरों के बाद पंडित जी ने फिर से हमको आगे कर दिया  .......

ससुराल पहुंचने पर गृहप्रवेश के समय भी ,मेरी सासू माँ ने आरती करते समय ,दिशा के अनुसार ,मुझको आधा कदम आगे कर दिया  | अब बताइए मेरी क्या गलती बिना मेरे कुछ बोले भी हर जगह मुझे आगे ही कर दिया जाता है | रही - सही कसर हमारे बच्चों ने पूरी कर दी | कभी भी कहीं जाना हो अथवा कुछ करना हो तो उनकी एक स्वर में मांग रहती " पहले आप !" 

अब इस नारी - मुक्ति के समय में मैं इन आंदोलनों का हिस्सा नहीं बन पाती हूँ ...(  बहुत कारण खोजे और मनन किया  तभी अचानक ज्ञान - चक्षु खुल गये कि मुझे  इन  आंदोलनों  की अथवा अपनी अनिवार्यता जताने की आवश्यकता  क्यों  नही  पड़ी !  दरअसल कभी भी  मैंने अपने स्त्री होने को लेकर शर्मिन्दगी नहीं महसूस की | अपनी गरिमा को भी समझा और अपने दायित्वों को भी | बस अब तो हमें किसी को कहना ही नहीं पड़ता "मुझे आगे बढने का अवसर दो !" 
                                                                                                                                                                              निवेदिता 

23 टिप्‍पणियां:

  1. इश्वर ने ही जब आपको पथ प्रदर्शक बनाया तो क्या जरुरत किसी आन्दोलन के बारे में सोचने की . और पहले आप और अवध , एक दुसरे के पूरक है. :)

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  2. समस्या सामाजिक है... ज़रूरी नहीं कि खुद के साथ भी समस्या हो . किसी और स्त्री की समस्या अपनी ही है

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    1. दी ,आप अपनी जगह सही हैं ... पर मेरे सोच सिर्फ यही है कि मैं हर जगह सिर्फ इसीलिये विरोध करूं कि मैं अपने स्त्री होने के प्रति अतिरिक्त रूप से सम्वेदनशील हूँ ...मैं तो स्थितियों को सहजता से लेने का प्रयास करती हूँ ..... वैसे भी आज के प्रचार माध्यमों में स्त्री को जिस रूप में दिखाया जाता है वहाँ पर हम सब चुप ही रह जाते हैं सिर्फ एक - दूसरे के ब्लॉग पोस्ट पर ही विरोध जता जाते हैं और इसका औचित्य कम से कम मुझे तो समझ नही आता है ... इस आलेख को मैंने महज परिहास के रूप में लिखा था और इसको ऐसे ही पढ़ें... सादर !

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  3. काम में आगे कर देना भी विकास की ही निशानी है...

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  4. बढ़िया बढ़िया बहुत बढ़िया.................
    सहमत हूँ पूरी तरह..
    शायद हम भाग्यशाली हैं निवेदिता.....मगर रश्मि दी की बात भी गौर करने लायक है...
    पर फिलहाल तो हम इतरा लें.
    :-)

    सस्नेह
    अनु

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    1. रश्मी दी को जो लिखा है वही आपके लिए भी है ...... परिहास को परिहास ही समझना चाहिए ...सस्नेह

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  5. वाह वाह नारी मुक्ति जिंदाबाद.

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  6. हमेशा आप को किसी के आगे कर दिया गया
    इस में आप का अपना क्या प्रयास रहा
    स्त्री होने की शर्मिंदगी आप को नहीं होती
    अच्छा लगा पर स्त्री से इन्सान बनने के सफ़र पर जो चल रही हैं
    वो क्या आप से कमतर हैं
    शायद नहीं क्युकी वो महज
    किसी और के "आगे बढाने से नहीं " खुद आगे बढ़ रही हैं
    पंडित ने फेरो में आगे कर दिया
    अरे किस के आगे कर दिया ?????
    सास ने आगे कर दिया
    अरे किस के आगे कर दिया ???
    एक पुरुष के ही ना
    इस से आप समान नहीं होगयी
    शर्मिंदगी नारी होने की
    उफ़
    आप ने ये सोच कर ही अपनी सोच को शर्मिंदा कर दिया
    स्त्री ही रही आप इन्सान बनने के सफ़र में पिछड़ी पर अपने घोसले की रानी , क्या वाकयी

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    1. रचना जी ,आप मुझसे वरिष्ठ लेखिका हैं ... मैं आपका सम्मान भी करती हूँ .... आपने शायद रश्मि दी की टिप्पणी पर मेरे उत्तर को नहीं पढ़ा .... इसको सहज परिहास के रूप में भी पढ़ कर देखें ... और हाँ ये तो सच है स्त्री तो मैं हूँ ही ... इंसान बनाने के सफर में क्या रहा ये तो वक्त बताता है ... अब आप आगे जो भी कहें मेरा अंतिम उत्तर यही है ....

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    2. निवेदिता जी
      ब्लॉग पर क़ोई बड़ा छोटा नहीं होता हैं
      स्त्री के ऊपर स्त्री परिहास करे ये सही हैं क्या

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  7. Hmmm...Dil ko khush rakhne ko 'ghalib' ye khayaal achcha hai...

    Achcha parihas banaya hai aapne women ka lekhni ke madhyam se...kya karen isme bhi ham women ko aage kar diya gaya hai:-) Tabhi to log kahte hain stri hi stri ki dushman hoti hai...hehehe.

    Waise ham aaj net surfing kar rahe hain aur blog likh rahe hain to iska matlab ye nahi ki duniya ki adhiabadi(nariyan) bhi hamare hi jaise lucky hain...Aap Sunita Krishnan ko janti hain? Agar haan to please at least once watch her video just to realize yourself where are you now. Don't mind it please and do not take other way of my words.

    rgds.

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  8. सच कहूँ मुझे आपका लिखने का यही अंदाज़ बहुत भाता है परिहास में लपेट कर गहन .......आप बहुत अच्छे व्यंग्य लिख सकती हैं ।

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  9. लेखक लिख भर सकता है मगर प्रकाशित होने के बाद वह क्या है, यह लेखक नहीं पाठक तय करता है। लेखक कह भर सकता है कि यह व्यंग्य है, परिहास है, गहरा चिंतन है, कविता है मगर तय करना पाठक का काम है। मुझे यह परिहास नहीं लगा। मेरे खयाल से एक नारी जिसे नारी होने के कारण कोई शर्मिंदगी नहीं उठानी पड़ी उसने गर्व के साथ अपने भावों को अभिव्यक्त किया है। इससे यह भी पता चलता है कि भारत में नारियाँ सुखद एहसास के साथ भी संपूर्ण जीवन व्यतीत करती हैं। मुझे तो इसे पढ़कर खुशी हुई।

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