सोमवार, 27 अगस्त 2012

मैं डर जाती हूँ .... क्यों ?


जब भी गूँजी कहीं गोली की आवाज़ 
या बिखरी कहीं किसी दंगे की बात 
बेसबब ये बाँहें फ़ैल गयी 
चाहत उभरी इस पूरे जहान को 
अपने विश्वास के दरकते दामन में 
समेट कर सबसे ओझल कर देने की 
हर वहशत ,हर दहशत से बचा 
अपनी कोख में वापस छुपा लेने की 
जब तुम्हे दिखेगी हर तरफ सिर्फ ...
हाँ ! सिर्फ और सिर्फ माँ 
एक ऐसी व्याकुल सहमी माँ 
जो परेशान है ,तुम्हारी सलामती के लिए 
शायद तब तुम्हारे हाथ काँप जायेंगे 
कभी बंदूक तो कभी शमशीर उठाने से 
माँ नहीं सह सकती तुम्हारी तरफ उठी पलक भी 
तुम भी तो हर तरफ दिखती माँ पर 
प्रहार करने से पछताओगे 
अब भी तो रुको कभी तो सोचो 
भागते कदमों की आती आवाजें 
लुढ़कते  पत्थरों की आती धमक 
लहू की बहती अजस्र धार 
मैं डर जाती हूँ .... क्यों ?
क्योंकि मैं तो सिर्फ माँ हूँ 
तुम्हे सलामत देखना चाहती हूँ !!!
                                         -निवेदिता 

14 टिप्‍पणियां:

  1. डर जायज सा है। सबकी सलामती की दुआ करते हैं।

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  2. माँ की सम्वेदना वेदना को नमन!!
    मार्मिक अभिव्यक्ति!!

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  3. निश्छल वात्सल्य तो हमेशा ही संतान के कल्याण प्रति सपर्पित और सुरक्षा के प्रति सशंकित रहता है . आपने इस पीड़ा को सहज शब्द दे दिये . सुँदर.

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  4. मन में डर तो बना रहता है..विश्वास भी बना रहे..

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  5. कहां क्‍या हो जाए ..
    ईश्‍वर का भरोसा रहता है बस ...
    अच्‍छी अभिव्‍यक्ति !!

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  6. मैं डर जाती हूँ .... क्यों ?
    क्योंकि मैं तो सिर्फ माँ हूँ
    तुम्हे सलामत देखना चाहती हूँ !!!

    यह डर स्वाभाविक है।

    सादर

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  7. क्या कहूं समझ नहीं आया, लेकिन इस कविता में जो है वो दिल तक पहुँच गया...

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  8. बच्चॊं के लिए ये डर स्वाभाविक है। ...

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  9. माँ अपने पंखों से बाहर चाहती तो है उड़ते देखना....पर नज़र से डरती है और मंडराते गलत ख्यालों से

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  10. दिल को छू लेने वाली अभिव्यक्ति ....

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  11. दुनिया की हर माँ येही चाहती अहि की उसका बच्चा ठीक रहे ... मार्मिक उदगार लिखे हैं आपने ...

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