रविवार, 9 सितंबर 2012

तलाश लिया तुमने बाईपास .....


कभी ओस की बूँद कहा
कभी पलकों तले का स्वप्न
कभी फूलों से मिलाईं
सुरमयी सुरभित मुस्कान
नाता भुला कर दिया  कभी
कोमल पावन दामन तार-तार
कभी प्रस्तर मूरत बना
नानाविध पकवान्न सजाये
भोग लगा आप ही उदरस्थ कर गये
न्याय के दरबार में भी सजा दिया
पर रहे आदत से लाचार
हाथों में तो थमा दी न्याय की तुला
नयनों की रोशनी छीन बाँध दी पट्टिका
अब तो जो तुम बोलो वही सुनूँ
जैसा वर्णित करो वही अंधी आँखें देखें
प्रस्तर बन गयी मूरत में भी धडकन बन
दिल अभी शेष है ,कभी उसको भी तो देखो
इन शिराओं में आया कैसा अवरोध
गतिरोध बन रक्त प्रवाह थाम रहा
रास्तों में ही नहीं रिश्तों में भी
तलाश लिया तुमने बाईपास .....
                                     -निवेदिता


18 टिप्‍पणियां:

  1. एक शिकायत ,एक आह दोनों का खूबसूरत समन्वय दोनों बातों को बयाँ करने में सफल हुई रचना बहुत सुन्दर |

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  2. बेहतरीन अद्भुत रचना के लिये ,,,,बधाई निवेदिता जी,,,,
    RECENT POST,तुम जो मुस्करा दो,

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  3. अध्बुध ... नए बिब को ले के लिखी रचना ...

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  4. रक्त तो सिराओं में ही पोषण देगा...

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  5. सही हैं ...हर भाव को अपनी सही जगह मिली हैं ....

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  6. वाह!
    आपके इस उत्कृष्ट प्रवृष्टि का लिंक कल दिनांक 10-09-2012 के सोमवारीय चर्चामंच-998 पर भी है। सादर सूचनार्थ

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  7. गज़ब के बिम्ब सजाती हैं आप .

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  8. रास्तों में ही नहीं रिश्तों में भी
    तलाश लिया तुमने बाईपास ........वाह बहुत ही सुन्दर।

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