बुधवार, 6 जुलाई 2011

तुम्हे देव पुकारूँ........

आज सोचती हूँ तुम्हे देव पुकारूँ
तो हे सूर्य देव तुम्हे कुछ बतलाऊँ ,
तुमसे निगाह नहीं मिला पाते हम ,
कभी कहते आँखों में चमक लगती ,
पर अगले ही पल अचानक ...
आँखों में अंधियारा छा जाता,
सच में तुम बहुत जलाते हो .....
पर ये तो उस से भी बड़ा है सच ...
देव हमें जलाने से पहले 
तुम ख़ुद भी झुलस जाते हो !
सांध्य काल तुम्हारी 
कम होती प्रखरता ,
प्रफुल्लित करती मन .......... 
पर अगले ही पल ,
घिरता अंधियारा 
याद तुम्हारी लाता 
चंदा को विदा करती ऊषा ....... 
अपनी लालिमा से 
सजाती विस्तृत आकाश , 
तुम्हारे स्वागत में 
अर्ध्य जल लिए खड़े हम 
कभी सूर्यान्जली देते 
कभी करते सूर्य नमस्कार 
सराहते स्वीकारते तुमको ..... 
पर फिर वही ...........
तुम्हारी तीखी प्रखरता 
विचलित  कर जाती मन .... 
                                 -निवेदिता  

16 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन के दो पहलू ...
    एक सोच देती ..सुंदर रचना ...

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  2. प्रखरता विचलित कर जाती है, पर अन्ततः वही काम आती है।

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  3. तुम्हारी तीखी प्रखरता
    विचलित कर जाती मन

    बहुत ही बढि़या ।

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  4. कभी सूर्यान्जली देते
    कभी करते सूर्य नमस्कार
    सराहते स्वीकारते तुमको .....
    पर फिर वही ...........
    तुम्हारी तीखी प्रखरता
    विचलित कर जाती मन ..

    दोनों स्थितियों का अच्छा विश्लेषण ...अच्छी प्रस्तुति

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  5. सच में तुम बहुत जलाते हो .....
    पर ये तो उस से भी बड़ा है सच
    देव हमें जलाने से पहले
    तुम ख़ुद भी झुलस जाते हो !... aur yahi baat hamen khud ko mitaker kisi ko banane ki prerna deti hai ... jo jalan tum hamen dete ho wah hamare liye zaruri bhi hai, per iske liye tumko jalna hota hai

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  6. सच है की तेज सहना आसान नहीं ... पर उसके बिना जीना भी आसान नहीं ... विश्लेषण करती रचना ...

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  7. सूरज का मानवीकरण कर कविता में आपने वह हर बात रख दी है जो शायद सरलता से कहना संभव न हो पाता.
    सार्थक व भावनात्मक पोस्ट के लिए आभार.

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  8. दो स्थितियों का अनुपम चित्रण.सूर्य को विषय-वस्तु बना कर लिखी गई भावाभिव्यक्ति अति-सुंदर. इसी सूर्य का परिचय पाने मेरी रचना "अरुण का परिचय "जरूर पढ़ें.

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  9. असूर्यस्पर्शी बनने में ही गनीमत है ,कुंती का हश्र भला कौन चाहेगा :)

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  10. निवेदिता जी आपकी पंक्तियों के लिए मैं यही कहना चाहुंगा कि
    "मैं हर सुबह भरता हूँ मांग क्षितिज की
    और शाम को कर देता हूँ विधवा
    क्योंकि अँधेरे में जकड़ी हुई दुनिया को
    रौशन करने के लिए
    मुझे दिन भर जलना पड़ता है."
    शुभकामनाएँ

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  11. bahut hi gahan vishleshan.....badhiya...badhai itni sarthak rachna ke liye..

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