गुरुवार, 1 सितंबर 2011

संबंधों की काँवर..........



                                                 काँधे पर लिए संबंधों (?) की काँवर
                                                 अपनी धुन में रिश्ते यूँ ही निभाते रहे 
                                                 पिछली रिसती साँसे अनदिखी रहीं 
                                                 सलामत रहे रिश्ते टीस सा चुभते रहे 


                                                सोचा दरारों में कुछ फूल पनप जाएँ 
                                                टूटन से बहते पलों को यादें थाम लेंगी 
                                                सुरभित पुष्प न सही कहीं से कभी तो 
                                                थोड़ी सेवार बहते लम्हों की बाँह गहेगी



                                                  नाकाम सी उम्मीद लिए रीतते लम्हों को 
                                                  नई पहचान देते झूठा सुकून तलाशते रहे 
                                                  शून्य सी पहचान लिए दायरे का अनदिखा 
                                                  सिरा तलाशते रह गये ..................



                                                  टूटे बरतन या चिटके फूलों से सजा गुलदान
                                                  सच अंतिम परिणति तो सिर्फ इतनी ही है 
                                                  दोनों की माटी को माटी में ही मिल जाना है
                                                  मन बावरा बहकता रहा भटकता रहा ....... 
                                                                                        -निवेदिता 


31 टिप्‍पणियां:

  1. niveditaa bahan aapke blog pr likhi aek aek rchnaa or uskaa prstutikaran vaah khin nzar naa lg jaye pliz nazar zrur utaar lena ......akhtar khan akela kota rajsthan

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  2. टूटे बर्तन या चिटके फूलों से सजा गुलदान
    सच अंतिम परिणति तो सिर्फ इतनी ही है
    दोनों की माटी को माटी में ही मिल जाना है

    ये पंक्तियाँ बहुत कुछ कह देती हैं।
    गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएँ।

    सादर

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  3. बेहद गहन मगर दिल को छूती अभिव्यक्ति।

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  4. रिश्ते तो अस्तित्व हल्का करने वाले हों।

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  5. हम अधिकांश संबंधों को जी नहीं पाते, उन्हें ढोना ही पड़ता है...
    बहुत खूबसूरती से लिखा आपने ... धन्यवाद..

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  6. काश !!! रिश्ते कुछ आसान होते...

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  7. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  8. कल 2/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  9. टूटे बर्तन या चिटके फूलों से सजा गुलदान
    सच अंतिम परिणति तो सिर्फ इतनी ही है
    दोनों की माटी को माटी में ही मिल जाना है
    मन बावरा बहकता रहा भटकता रहा ...बहुत गहन अनुभूति लिए सार्थक रचना.......

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  10. टूटे बर्तन या चिटके फूलों से सजा गुलदान
    सच अंतिम परिणति तो सिर्फ इतनी ही है
    दोनों की माटी को माटी में ही मिल जाना है
    मन बावरा बहकता रहा भटकता रहा .......

    ...गहन चिंतन का बहुत सुन्दर और प्रभावी चित्रण..

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  11. माटी को माटी में ही मिल जाना है....

    बहुत बारीक-सी कहन...मन को छूने वाली...

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  12. टूटे बर्तन या चिटके फूलों से सजा गुलदान
    सच अंतिम परिणति तो सिर्फ इतनी ही है
    दोनों की माटी को माटी में ही मिल जाना है
    मन बावरा बहकता रहा भटकता रहा ...


    यथार्थ को कहती पंक्तियाँ ... बहुत अच्छी प्रस्तुति

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  13. टूटे बर्तन या चिटके फूलों से सजा गुलदान
    सच अंतिम परिणति तो सिर्फ इतनी ही है
    दोनों की माटी को माटी में ही मिल जाना है
    मन बावरा बहकता रहा भटकता रहा .......

    Waah...Gahan Vichar

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  14. बहुत सुंदर कविता ,गहरे भावार्थ बधाई और शुभकामनाएं

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  15. टूटे बर्तन या चिटके फूलों से सजा गुलदान
    सच अंतिम परिणति तो सिर्फ इतनी ही है
    दोनों की माटी को माटी में ही मिल जाना है
    मन बावरा बहकता रहा भटकता रहा .......bhaut hi sarthak aur bhaavmayi panktiya...

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  16. बहुत सुन्दर रचना...
    और भावानुरूप चित्र... वाह..
    सादर बधाई...

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  17. टूटे बर्तन या चिटके फूलों से सजा गुलदान
    सच अंतिम परिणति तो सिर्फ इतनी ही है
    दोनों की माटी को माटी में ही मिल जाना है
    मन बावरा बहकता रहा भटकता रहा .......
    bejod bhaw

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  18. टूटे बर्तन या चिटके फूलों से सजा गुलदान
    सच अंतिम परिणति तो सिर्फ इतनी ही है
    दोनों की माटी को माटी में ही मिल जाना है
    मन बावरा बहकता रहा भटकता रहा .......

    सूफी चिंतन से परिपूर्ण एक गहन आत्मानुभूति ...हार्दिक शुभ कामनाएं एवं अभिनन्दन !!!

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  19. भावत्मक अभिव्यक्ति देती इस कविता में लगाए आपके चित्र ने एक-एक शब्द को सजीव कर दिया है।

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  20. यथार्थ को कहती पंक्तियाँ ... बहुत अच्छी प्रस्तुति

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  21. बहुत गहन अनुभूति लिए सार्थक रचना| धन्यवाद|

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  22. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 05-09-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  23. टूटे बर्तन या चिटके फूलों से सजा गुलदान
    सच अंतिम परिणति तो सिर्फ इतनी ही है
    दोनों की माटी को माटी में ही मिल जाना है
    मन बावरा बहकता रहा भटकता रहा ....... shandaar.rachna...hardik badhayee...

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  24. यथार्थ ........बहुत गहरी अभिव्यक्ति

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  26. टूटे बरतन या चिटके फूलों से सजा गुलदान
    सच अंतिम परिणति तो सिर्फ इतनी ही है दोनों की माटी को माटी में ही मिल जाना है मन बावरा बहकता रहा भटकता रहा ....

    गहरा जीवन दर्शन समेट दिया हैं इन लाइनों में ... बेहतरीन ..

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