शनिवार, 1 अगस्त 2020

नवगीत : बिलख बिलख वसुधा है रोती ...


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बिलख - बिलख वसुधा है रोती
समझ नहीं कोई पाया

हर्ष - विषाद उर में बस जाये  
प्रेम विशाल दिखा जाता ,
तब अंतर्मन संवाद करे 
नयन जलद सा खिल भाता ,
वीणा यादों की गान करे 
गीत पुरातन तब गाया ,
बिलख - बिलख वसुधा है रोती
समझ नहीं कोई पाया !
*
उम्मीदों की गगरी छलकी
समय विभीषण आ जाये ,
पर्वत - पर्वत घूम रहा था
छुपा अमिय रहा बताये ,
भूकम्पी सी आहट दे कर 
झटका घर को गिरा गया ,
बिलख - बिलख वसुधा रोती
समझ नहीं कोई पाया !
*
नयनों से जब जब नीर बहे
आसमान क्रंदन भरता ,
आस जगा साहस यूँ भर कर 
दायित्व वहन है करता ,
कर्तव्यों की बलिवेदी पर
हर पल की वह मौत जिया ,
बिलख - बिलख वसुधा है रोती
समझ नहीं कोई पाया !
 ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (02-08-2020) को     "मन्दिर का निर्माण"    (चर्चा अंक-3781)    पर भी होगी। 
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
    --

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  2. बहुत सुंदर नवगीत सरस भावपूर्ण।

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