शनिवार, 22 अक्तूबर 2011

भटकते बहकते पल .....


अंधियारी रातों की वीरानी 
रूखेपन को घोलता सन्नाटा 
गंगाजल .... ओस की बूँदें ...
कुछ भी नहीं चाहिए ...
जरूरी हैं जीवन - जल सी 
बस चंद अश्रु - बिंदु की आहट
रेगिस्तानी मारीचिका जैसे 
ओएसिस बन वीराने में 
बरसाते जीवंत ऊष्मा भरे 
भटकते बहकते  पल ........
                        -निवेदिता 

17 टिप्‍पणियां:

  1. जरूरी हैं जीवन - जल सी
    बस चंद अश्रु - बिंदु की आहट

    सुन्दर भाव ..

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  2. जरूरी हैं जीवन - जल सी
    बस चंद अश्रु - बिंदु की आहट
    रेगिस्तानी मारीचिका जैसे
    मन जब भींगा रहता है, तो सब अच्छा लगता है।

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  3. गहरे भाव।
    सुंदर प्रस्‍तुति।

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  4. बस आपकी पीड़ा पर कुछ अश्रु छलकने को उत्सुक तो रहें बस, जीवन में और क्या चाहिये?

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  5. आपकी यह सुन्दर प्रस्तुति कल सोमवार दिनांक 24-10-2011 को चर्चामंच http://charchamanch.blogspot.com/ की भी शोभा बनी है। सूचनार्थ

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  6. बहुत सुन्दर रचना....
    आपको दीप पर्व की सपरिवार सादर शुभकामनाएं

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  7. सुंदर रचना।
    दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।

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  8. सुन्दर भावाव्यक्ति।
    दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।

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  9. सुन्दर रचना!
    भावपूर्ण!
    दिवाली की हार्दिक शुभकामनायें!
    जहां जहां भी अन्धेरा है, वहाँ प्रकाश फैले इसी आशा के साथ!
    chandankrpgcil.blogspot.com
    dilkejajbat.blogspot.com
    पर कभी आइयेगा| मार्गदर्शन की अपेक्षा है|

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  10. सुन्दर प्रस्तुति...

    आपको धनतेरस और दीपावली की हार्दिक दिल से शुभकामनाएं
    MADHUR VAANI
    MITRA-MADHUR
    BINDAAS_BAATEN

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  11. कुछ भी नहीं चाहिए ...
    जरूरी हैं जीवन - जल सी
    बस चंद अश्रु - बिंदु की आहट
    रेगिस्तानी मारीचिका जैसे.

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