गुरुवार, 24 मार्च 2011

कितने रिश्ते जाते छूट.........

किसी एक के न रहने से ,
कितने रिश्ते  जाते हैं छूट ! 
कभी ज़िंदगी का सच थे ,
फिर तो बस झूठ की सौगात! 
रस्मों को निभाते ,
इक खोखली बुनियाद पे !
खोजने का प्रयास ,
बनती जाती  पहचान !
ये पहचान भी खो सी जाती ,
जब भी आते जीवन में झंझावात ! 
                          -निवेदिता -

13 टिप्‍पणियां:

  1. सच को कविता में ढाला है आपने.

    सादर

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  2. कभी कभी झंझावात निकलने के बाद कई रास्ते और दिखने लगते हैं।

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  3. यथार्थ चित्रण.
    बढ़िया रचना.

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  4. जीवन की सच्‍चाई......बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना!

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  5. भाव पूर्ण रचना |बधाई |
    आशा

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  6. बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना| धन्यवाद|

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  7. आप सबका आभार !!!!
    @प्रवीण जी ,रास्ते दिख जायें ,तब वो झंझावात नहीं होते । आभार !

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  8. kya baat hai. gulzar sahab ki ek gazal yaad aa gai.hath chhoote bhi to rishte nahi chhoda karte.

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