शनिवार, 17 दिसंबर 2011

बर्फीले एहसास !!!


अजीब से हैं
ये बर्फीले एहसास
इस रूह को भी
कंपकंपाते ..
साँसों को थामने 
बढ़ते दुआओं के
साए तले जज़्बात !
तुमने तो खुद को
छुपा ही लिया
ज़िन्दगी की
गर्माहट तले ,
फिर मुझे क्यों दी
बर्फीली चट्टान की
ठिठुरती शय्या !
चाय के प्याले से
उठती भाप के
गुनगुनी गुबार तले
औरों को आवाज़ दी
कड़क बर्फ लगाने को !
तुम तो गर्म दुशालों में
सिकुड़ ठंड भगाते रहे
मुझे बर्फ पे सुला
सिकुड़ने को मजबूर किया !
ये कैसे दुनियावी दस्तूर
मेरी निर्जीव शक्ल
औरों को दिखलाने को
मुझको ही विकृत बनाते रहे !
                              -निवेदिता 

34 टिप्‍पणियां:

  1. मन की संवेदनाओं के कपाट खोलती अच्छी प्रस्तुति

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  2. ये कैसे दुनियावी दस्तूर
    मेरी निर्जीव शक्ल
    औरों को दिखलाने को
    मुझको ही विकृत बनाते रहे !...bahut badhiya

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  3. ये कैसे दुनियावी दस्तूर
    मेरी निर्जीव शक्ल
    औरों को दिखलाने को
    मुझको ही विकृत बनाते रहे !...बेहतरीन भाव ...

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  4. samvedan shil rachna ...duniyan ke dastur to kuchh nirale hi hain

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  5. आपका पोस्ट पर आना बहुत ही अच्छा लगा मेरे नए पोस्ट "खुशवंत सिंह" पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

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  6. सटीक भावों की बहुत सुंदर अभिव्यक्ति...

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  7. कुछ लोगों की संवेदना ही बर्फ़ीली हो जाती है।

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  8. तुम तो गर्म दुशालों में
    सिकुड़ ठंड भगाते रहे
    मुझे बर्फ पे सुला
    सिकुड़ने को मजबूर किया !
    ये कैसे दुनियावी दस्तूर
    मेरी निर्जीव शक्ल
    औरों को दिखलाने को
    मुझको ही विकृत बनाते रहे !waah bahut sahi sundar abhiwaykti ....

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  9. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  10. बर्फीले एहसास दुनियावी दस्तूर के तले दफन हो जाते हैं।

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  11. ये कैसे दुनियावी दस्तूर
    मेरी निर्जीव शक्ल
    औरों को दिखलाने को
    मुझको ही विकृत बनाते रहे

    बहुत गहरी बात लिए पंक्तियाँ ..... सुंदर रचना

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  12. तुमने तो खुद को
    छुपा ही लिया
    ज़िन्दगी की
    गर्माहट तले ,
    फिर मुझे क्यों दी
    बर्फीली चट्टान की
    ठिठुरती शय्या !
    Bahut achchha laga ye hissa.

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  13. so intense, deep and yeah cold expressions..
    great metaphors u used :)

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  14. जब रात बीतती है जग की,
    स्नेहिल धूप निकल आती,
    यह बर्फ व्यग्र तब पिघलेगी,
    भावों की गंगा निकलेगी।

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  15. बहुत कम शब्दों में गंभीर बात कहना / साथ ही एक दार्शनिक चिंतन भी कि निर्जीब शक्ल को औरों को दिखाने विकृत बनाते रहे / इसका एक अर्थ उस ओर भी लिया जा सकता है जब म्रत्यु उपरांत शब को कुछ अवधि तक सुरक्षित रखने वर्फ में रख दिया जाता है / दूसरे कोइ बहुत आराम में रहे और दूसरा कष्ट भोगता रहे उस कष्ट भोगने को भी वर्फ पर सुलाना कहा जा सकता है / वर्फीली चट्टान की शैया भी एक कष्ट को कहा जा सकता है / बहुत ही उत्तम रचना है

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  16. कल 19/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  17. निर्जीव शक्ल.. विकृत, बहुत बढ़िया..

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  18. एक संवेदनशील मन की व्यथा.. सुन्दर रचना...
    सादर...

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  19. सुन्दर भाव गहरे अहसास लिए मनभावन कविता.....

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  20. बहुत खूब.....संवेदनशील रचना..

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  21. लगता है जैसे व्यथा ने व्यथा के लिये व्यथा से व्यथा की
    व्यथा लिखी हो। बार-बार पढ़ने को मन चाहता है। वाह
    कमाल, शब्द-शब्द में पीड़ा।

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  22. गहरी भावपूर्ण अभिव्यक्ति ....

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