बुधवार, 14 दिसंबर 2011

मुकम्मल जहां ......

          
               एक शब्द "काश" अक्सर हमारी ज़िन्दगी के पन्नों पर उभर आता है | ये सब कुछ होते हुए भी आ सकता है ,जो ज़िन्दगी से असंतुष्टि नहीं दिखाता ,बस सिर्फ अपनी बेलगाम दौडती कल्पना का एक परिदृश्य झलका जाता है | कभी अंधियारे लम्हों में अपूर्ण बना शून्य का एहसास दिला जाता है | लगता है कि जो भी चीज़ हमारी ज़िन्दगी में नहीं है ,उसके बिना हमारा संसार अधूरा है | इसको मुकम्मल बनाने के लिए ,इसके हरएक लम्हे को जीवंत करने के लिए उस अप्राप्य की तलाश में जो हमारे हाथों में है उसको भी गंवाते चले जाते हैं | हो सकता है कि जब वो मिल जाए तो शायद वह कुछ मिल भी जाए ,परन्तु तब शायद जो हमारे पास है वो हमसे छूट सकता है |
            अभी जो भी समीकरण हमारे जीवन में बना है ,उसमें ही हमारा स्वत्व झलकता है | इसके हर लम्हे में हम ही साँसे लेते हैं | परछाईं के साकार होने की तलाश में व्यर्थ का भटकाव सिर्फ वंचित होने का एहसास दे कर हर सांस को दूभर बना देगा | इसका एक सबसे बड़ा नकारात्मक पहलू ये भी है कि जो परिस्थिति किसी एक के लिए सम्पूर्ण सी होती है वो दूसरे के लिए अपूर्ण होती है !
              शायद इस भटकाव का अंत अपने खुद के जीवन के प्रति एक वितृष्णा को जन्म देगा और एक वीरानेपन के एहसास के साथ उसका अंत तलाशना चाहेगा | जीवन की राहें जब जिस डगर ले जाएँ ,उसके हर पग का मान रखते हुए जीना चाहिए | मुकम्मल जहां की खोज तो की जा सकती है पर उसका मिलना कुछ असम्भव सा ही है , क्योंकि  ये तो हर पल बदलती मानवीय प्रकृति ही है जो बदलते मानसिक परिवेश के साथ वस्तुस्थिति को देखने का नजरिया भी बदल देती है |

16 टिप्‍पणियां:

  1. एक शब्द "काश" अक्सर हमारी ज़िन्दगी के पन्नों पर उभर आता है |
    very true !!!

    Nice read :)

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  2. 'काश' जीवन का विश्राम बिन्दु है।

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  3. हर किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता ...
    ये बात बिलकुल सत्य है ... और इस तृष्णा की तलाश में जो है हम उसे भी खो देते है ... विचारणीय पोस्ट .....

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  4. kaash ek mragtrashna ko ingit kartahua shabd hai kaash yeh hota kash veh hota.

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  5. जीवन की राहें जब जिस डगर ले जाएँ ,उसके हर पग का मान रखते हुए जीना चाहिए |

    ....बहुत सच कहा है...बहुत सारगर्भित पोस्ट

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  6. इसको मुकम्मल बनाने के लिए ,इसके हरएक लम्हे को जीवंत करने के लिए उस अप्राप्य की तलाश में जो हमारे हाथों में है उसको भी गंवाते चले जाते हैं | हो सकता है कि जब वो मिल जाए तो शायद वह कुछ मिल भी जाए ,परन्तु तब शायद जो हमारे पास है वो हमसे छूट सकता है |……………यही तो भटकन है और इससे बचना जरूरी है।

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  7. कभी किसी को मुकम्‍मल जहां नहीं मिलता

    किसी को जमीं तो किसी को आसमां नहीं मिलता।
    विचारणीय पोस्‍ट.....

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  8. जबरदस्त अभिवयक्ति.....वाह!
    बहुत ही अच्छी.

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  9. vakai kisi ne bilkul sach kaha hai mukammal jahan nahi milta hai ....sunder

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  10. मुकम्मल की तलाश ही जीवन है, यदि मिल जाये तो मुक्ति है, जीवन का अंत। मोक्ष। आत्मा का परमात्मा में विलय।

    जबतक जीवन है तबतक कुछ तलाशता मन है, मन की उलझन है, अपने से अनबन है, सुख और दुख की लहरों के बीच उठता गिरता तन मन धन है। इससे पार पाने की ललक इसे ही आगे बढ़ाती है। जो पार पा गया उसे जीवनमुक्ति दिलाती है। आवागमन के चक्कर से छुटकारा दिलाती है।

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  11. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

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  12. मन के अभिव्यक्ती की सुंदर प्रस्तुति,..बढ़िया पोस्ट....
    मेरी नई पोस्ट की चंद लाइनें पेश है....

    नेता,चोर,और तनखैया, सियासती भगवांन हो गए
    अमरशहीद मातृभूमि के, गुमनामी में आज खो गए,
    भूल हुई शासन दे डाला, सरे आम दु:शाशन को
    हर चौराहा चीर हरन है, व्याकुल जनता राशन को,

    पूरी रचना पढ़ने के लिए काव्यान्जलि मे click करे

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  13. "काश"... इसका कोई अंत नहीं...

    अच्छा लिखा आपने..!

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