बुधवार, 7 दिसंबर 2011

आज तो बस ............




आज निगाहें पीछे मुडना चाहती है
कहीं कुछ छूट गया था ,थोड़ा पहले
वक्त समेट संजोये  रखना चाहतीं हूँ
कहीं यादों में ,वादों में जो रह गया
अनसुना बस वही सुनना चाहती हूँ
सदा फूलों की ,ओस की ,रोशनी की
देखती सुनती बोल गुनगुनाती रही ,
आज सिर्फ इस धुंध की ,पतझड की
अंधियारी गहराइयों की नीरव पड़ी
राह की धूल बुहार हटाना चाहती हूँ
जानती हूँ पीछे मुडना ,आगे की राहें
कहीं सपनों सा अटक ठहरा जायेंगी
उसी दायरे में घूमती सी रह जाऊंगी
गति थमने की सजा ,राह भटक चुके
लम्हों की नियति कैसे बनी रहने दूं
पीली पड चुकी पत्तियों को निहार कर
बसंत सा खिलखिलाना चाहती हूँ ........
आज तो बस पीछे मुडना चाहती हूँ !
                                   -निवेदिता 

27 टिप्‍पणियां:

  1. बढते रहना ही जीवन है। पीछे देखना भी पडता है।

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  2. विगत को याद करते हुए आगे तो बढ़ना ही है ... अच्छी प्रस्तुति

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  3. याद रहा कुछ माणिक सा देखा था आते राहों में।

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  4. स्मृति रे कहे मोरे नैन बसी ...
    स्मृतियों में अटका मन आगे बढ़ने की राह खोज रहा है ...
    सुंदर रचना ....

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  5. आगे बदना ही जीवन की नियति है...........

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  6. आगे बढ़ना ही जीवन है किन्तु कभी-कभी
    बीते वक्त को देख लेना अच्छा रहता है...
    सुन्दर रचना!

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  7. अतीत को चुभला कर बार बार वैसा ही स्वाद पाने की अभिलाषा सदैव मन में बनी है काश ! पा सकते...... सुन्दर भावपूर्ण कविता के लिए आभार.
    मेरे ब्लॉग में कुछ problem आ गयी है, खुल ही नहीं पा रहा है, इसलिए लाचार हूँ. खैर !

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  8. सुंदर शब्दों के संयोजन से रची रचना अच्छी लगी आभार

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  9. वाह! बहुत सुन्दर.
    संगीता जी की हलचल में सजी आपकी प्रस्तुति अच्छी लगी.

    आपका आभार.
    संगीता जी का आभार.

    मेरे ब्लॉग पर आईयेगा,निवेदिता जी.

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  10. बसंत सा खिलखिलाना चाहती हूँ ........
    आज तो बस पीछे मुडना चाहती हूँ !

    पिछला याद रखना और आगे की सोचना ,यही तो समझदारी है।

    सादर

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  11. जीवन मैं संताप घनेरे
    धूप छाँव सुख दुःख के घेरे
    संचित मन मे इस्म्रतियों को
    मन से अब बिसराना होगा
    आगे बड़ते जाना होगा ...बहुत भावपूर्ण रचना

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  12. जीवन का कटु सत्य है.... जिससे आपने अवगत कराया है....

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  13. looking back is so endearing at times and it is often rewarding to walk down the memory's lane!

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  14. नवेदिता जी,...
    जीवन में आगे बढ़ने के लिए सोचना चाहिए,..
    बीती ताहि बिसार दे,आगे की सुधि ले,...सुंदर पोस्ट
    मेरे पोस्ट में आपका इंतजार है,...

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  15. पीली पड चुकी पत्तियों को निहार कर
    बसंत सा खिलखिलाना चाहती हूँ ........
    आज तो बस पीछे मुड़ना चाहती हूँ !

    जिजीविषा को दर्शाती बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति ! बसंत सा जीवन हो जाये तो क्या बात है ! बहुत सुंदर रचना ! बहुत बहुत बधाई !

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  16. ज्यादा कुछ न मांगती कविता... एक ख़ुशी खुद से लेकर खुद को देने की रखती... वाह !

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