बुधवार, 21 अगस्त 2019

बेबसी



कंकाल सी उसकी काया थी
पेट पीठ में उसके समायी थी

बेबसी वक्त की मारी थी
कैसी वक्त की लाचारी थी

डगमगाते पग रख रही थी
मानती ना खुद को बेचारी थी

पुकार अबला की सुन नहीं पाती थी
पुत्रमोह में बन गयी गांधारी थी

अपना कर्मफल मान सह गई
पहले कभी की न कुविचारी थी

हर पल जीती जी मर गई
कमजोर पलों की गुनहगारी थी ... निवेदिता

2 टिप्‍पणियां:

  1. सारा दर्द शब्दों में निचोड़ कर रख दिया आपने |

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (23-08-2019) को "संवाद के बिना लघुकथा सम्भव है क्या" (चर्चा अंक- 3436) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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