गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

पुलकित प्रमुदित मन साथी मधुमास बना ....



छल -छल करती 
सरिता कह लो 
या निर्झर बहते जाते 
नीर नयन से
तरल मन अवसाद सा 
बहा अंतर्मन से
कूल दुकूल बन 
किसी कोर अटक रहे
पलकें रूखी रेत संजोये 
तीखे कंटक सी चुभी
ओस का दामन गह 
संध्या गुनगुनायी थी
नमित थकित पत्र 
तरु का भाल बना
धूमिल अवसाद न समझ
इस पल को
आने वाली चन्द्रकिरण का
हिंडोला बन
शुक्र तारे की खनक झनक सा
उजास भरा
पुलकित प्रमुदित मन साथी
मधुमास बना .........  निवेदिता

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (05-12-2015) को "आईने बुरे लगते हैं" (चर्चा अंक- 2181) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. काफी दिनों बाद आपके ब्लॉग पर आया। कविता पढ़कर अच्छा लगा। साधुवाद।

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  3. सुंदर और भाव विभोर कर देने वाली पंक्तियाँ लिखी है आपने.
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है.
    http://iwillrocknow.blogspot.in/

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