बुधवार, 9 दिसंबर 2015

तन्हा .........





शब्दों की भीड़ में
एक अक्षर तन्हा  …
रिश्तों की भीड़ में
एक मन तन्हा  ....
सुरों की सरगम में
एक सुर तन्हा  .....
खिलखिलाते ठहाकों में
एक मुस्कान तन्हा  ....
सतरंगी सा सजा इन्द्रधनुष
ये एक रंग तन्हा  .......
यादों - वादों से भरी ये किताब
अंतिम कोरा पन्ना तन्हा  .......
बैठ पर्वत के शिखर पर
जीती हूँ एक साँस तन्हा  ......... निवेदिता

9 टिप्‍पणियां:

  1. हर दिल कहीं न कहीं कभी न कभी किसी ना किसी मोड़ पर तन्हा होता ही है। क्योंकि शायद इस ज़िन्दगी को थोडा बहुत समझ कर जीने के लिए तन्हाई भी ज़रूरी है।

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  2. हूँ, सबके बीच अकेलापन । यह भी एक सच है , बढ़िया लिखा आपने

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  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 10 - 12 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2186 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  4. बहुत सच्ची और सुंदर प्रस्तुति। ये दिल भटके कहाँ कहाँ तनहा।

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  5. अकेलेपन के कारण ही, साथ के सुख याद रहते हैं ! मंगलकामनाएं आपको

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  6. पयारी-सी कविता ।
    तन्हा होने पर ही स्व का अहसास होता है ।

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  7. एकला चोलो रे । यही एक मार्ग है।

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  8. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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