रविवार, 15 सितंबर 2013

न बह जाएँ ……






ये आँसू 
बड़े ही 
धोखेबाज़ हैं 
जब जी चाहे 
अपनी सी 
कर ही  जाते हैं 
थामना चाहूँ 
तब भी 
थिरक कर 
बिखर जाते हैं 
पर आज  
सोचती हूँ 
इन आँसुओं को 
पलकों की ही 
कैद में रख लूँ 
कहीं बहते हुए 
आंसुओं संग 
तुम्हारी झलक 
या कह दूं
कसकती 
खिलखिलाती  
तुम्हारी यादें 
तुम्हारी बातें 
भी न बह जाएँ  …
                     - निवेदिता 

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छा लगा आंसुओं में समायी अनमोल चीजों को सहेजने की कोशिश को रचना का ये रूप देना.सुन्दर कृति.

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (16-09-2013) गुज़ारिश प्रथम पुरूष की :चर्चामंच 1370 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    हिन्दी पखवाड़े की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. नमस्कार आपकी यह रचना आज सोमवार (16-09-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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  4. बह ना जाएँ आंसू के संग यादें !
    बढ़िया है !

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  5. यादें तो ओर बढ़ जाती हैं इन आंसुओं के साथ ... निकल के चिपक जाती हैं पूरे जिस्म से ... भाव मय ...

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  6. आंसुओं में समायी अनमोल चीजों को सहेजने की बेहतरीन कोशिश आपने दिखाया है इन अनमोल पंक्तियों में आपका धन्यबाद।

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  7. आंसू तो आंसू हैं उनपर अधिकार नहीं होता
    जब चाहें आते है अपने आप चले जाते हैं
    आशा

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