सोमवार, 9 सितंबर 2013

चाहत एक अजीब सी ……



चाहा था 
तुम्हे थोड़ा 
कम ही चाहूँ 
पर  …… 
रोक न सकी 
खुद को 
और तुम 
तुमने तो बस 
एक भी पल 
न लगाया 
राह बदलने में 
शायद तुम थे 
कम चाहत लायक 
और हाँ ……. 
मैं भी थी 
कम  …… बहुत कम 
पीड़ा पाने लायक  ……. 
पर 
शायद 
ये तो एक उलझन है 
दिल और दिमाग के बीच 
दिमाग तो 
तुमको छोड़ 
आगे बढ़ जाना चाहता है 
पर 
ये दिल  …
ये तो बस तुम्हे ही 
अपनी साँसों में 
यादों में बसाना चाहता है  ……
                                      - निवेदिता 

11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति,,
    गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाए !

    RECENT POST : समझ में आया बापू .

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  2. इंसान बस दिल के हाथों ही तो मजबूर होता है ... तडपता है उम्र भर प्रेम में ...

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  3. मन को उलीचकर रख देती पंक्तियाँ

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  4. दिल ......इस दिल के हाथों ही तो मजबूर हैं हम सब।
    सुंदर भावपूर्ण कविता।

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  5. दिल ......इस दिल के हाथों ही तो मजबूर हैं हम सब।
    सुंदर भावपूर्ण कविता।

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