सोमवार, 7 नवंबर 2011

बहुरूपिया सी मनोवृत्ति ......

          
           हम सब अपने जीवन की पहली साँस से अंतिम साँस तक न जाने कितने रिश्तों को निभाते हैं | ये रिश्ते कभी-कभी अनदेखे भी होते हैं और अनजाने भी | अपनी हर आती-जाती साँसों में हम ये दावा भी करते हैं कि हमने अपना जीवन इन तथाकथित रिश्तों को समर्पित कर रखा है | कभी शांत मन से हम अपने इस दावे को परख कर देखें कि हम इन रिश्तों के प्रति कितने ईमानदार हैं ! अधिकतर यही पायेंगे कि जो रिश्ते हमारे जीवन का आधार हैं उन्हीं की अनदेखी भी हो जाती है | जो भी सम्बन्ध जितने दूर के हैं ,या यूँ कहें कि औपचारिक हैं उनके प्रति हम अधिकतर अतिरिक्त रूप से सतर्क रहते हैं | शायद इसके पीछे कारण यही होगा कि कुछ पलों को तो हम तलवार की धार पर चलने की सजगता रख सकते हैं ,हमेशा ऐसा नहीं कर सकते हैं | 
             इस तथ्य को मानते हुए भी कि मानव मन अपने निकट सम्बन्धों में तनावरहित शैथिल्य को जीना चाहता है ,हम अकसर एकपक्षीय क्यों हो जाते हैं | हम स्वयं तो तनावरहित रहना चाहते हैं ,परन्तु उसी व्यक्ति से हर पल की सजगता की अपेक्षा करते हैं | ये बहुरूपिया सी मनोवृत्ति जीवन जीने का सही तरीका तो हो नहीं सकती | 
              इस मनोवृत्ति का मूल कारण शायद यही हो सकता है कि हम अपने जीवन को जीने में नहीं अपितु किसी प्रकार बिता देने में विश्वास रखते हैं | जब से कुछ भी समझ पाने लायक होते हैं हमारे सामने एक "रिक्त स्थान भरो " जैसी जीवनशैली थमा दी जाती है और हम शेष जीवन उस निर्धारित लक्ष्य को पाने के प्रयास द्वारा उस "रिक्त स्थान " को भरने में बिता देते हैं | एक निश्चित परिपाटी के अनुसार पहले शिक्षा ,फिर कोई व्यसाय .उसके बाद विवाह और फिर पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते अपने जीवन के परम को पा जाने की अनुभूति करने लगते हैं | पर इस सब आपा-धापी में हम ज़िन्दगी का सम्मान करना भूल जाते हैं और जिन रिश्तों की वजह से ये सब सम्भव हो पाता है  उनकी ही अनदेखी कर जाते हैं | 
               हम जिस पल ये समझ जायेंगे कि जिन कि हम अनदेखी अथवा अवहेलना करते हैं ,शायद उन के साथ की वजह से ही जीवन ऐसा रूप ले पाया है | जिनको हम शून्य समझते हैं वही हमारे मूल्य में वृद्धि करते हैं | अगर ऐसा नही होता है तब इसके कारण हम खुद भी होते हैं क्योंकि हमने उस शून्य को उसका उचित स्थान नहीं दिया !
                 जीवन जीने का सही तरीका उसके हरएक पल को जी लेने में है |जो हमने पाया उसको भी और जो अनपाया रहा गया है उसको भी सकारात्मकता से स्वीकार करना चाहिए !

11 टिप्‍पणियां:

  1. न जाने कितनी रिक्तताओं को भरने में बीत जाता है जीवन।

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  2. बेहतर जीवन दर्शन।
    आभार............

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  3. घिचपिच मनःस्थिति या स्थिति हम खुद बनाते हैं अप्राप्य को प्राप्य बनाने के लिए और चाहते हैं कि दूसरा समझ जाए ...

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  4. सच है स्वयं के साथ ही एक अजब सा खेल चलता है जीवन भर .... सुंदर चिंतन

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  5. यह जीवन है.... इस जीवन का यही है है रंग रूप..... सार्थक पोस्ट....

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  6. पर इस सब आपा-धापी में हम ज़िन्दगी का सम्मान करना भूल जाते हैं और जिन रिश्तों की वजह से ये सब सम्भव हो पाता है उनकी ही अनदेखी कर जाते हैं |

    बिलकुल सच्ची बात कही है आपने...सार्थक लेख

    नीरज

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  7. जीवन में हर तरह के पल आते हैं और अधिकतर हम खुद ही कारण और निवारण होते अहिं ...

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  8. जीवन जीने का सही तरीका उसके हरएक पल को जी लेने में है |
    यही सार है!

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