सोमवार, 7 सितंबर 2020

लघुकथा (संवाद ) : दास्तान ए लेखनी और शमशीर ...

 दास्तान ए लेखनी और शमशीर ...


मेरे सामने तुम कुछ नहीं हो । तुमको तो चलने के पहले स्याही रूपी रक्त पीना पड़ता है ।


हाँ .. हाँ ... यदि मैं पहले रक्त पीती हूँ ,तब तुम भी तो बाद में रक्त ही तो पीती हो ।


तुमको तो इन्सान अंगुलियों के इशारे से नचाता रहता है ,जबकि मुझे चलाने में उसको पूरी ताक़त लगानी पड़ती है ।


मुझको चलाने के लिये वह बचपन से ही विधिवत शिक्षा भी लेता है और यदि तब नहीं सीख पाता तो उम्र के किसी भी पड़ाव पर सीखता है। तुम्हारी याद तो उसे तभी आती है ,जब वह इतना शक्तिशाली हो जाता है कि तुमको सम्हाल सके । 


बोल तो ऐसे रही हो जैसे तुम कोई बहुत तुर्रम खाँ हो ... 


हाँ ! हूँ मैं तुर्रम ख़ाँ 


कैसे ? 


अरे ! मुझे जानती नहीं हो ,जरा सा भी लहरा जाऊँ तो ख़ुदा को जुदा और अर्श को फ़र्श कर दूँ ... मेरे शब्दों में इतनी ताक़त है ।


हाँ ! मान गयी तुम मुझसे शक्तिशाली हो । मैं जब लहराती हूँ तब एक ही बार में जीवन ले लेती हूँ ,परन्तु तुम तो जिन्दा रहते हुए भी कई - कई बार मारती रहती हो । 

                                     ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (09-09-2020) को   "दास्तान ए लेखनी "   (चर्चा अंक-3819) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --  
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
    --

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  2. आदरणीया निवेदिता जी, नमस्ते! कलम और तलवार का यह संवाद आपने अद्भुत ढंग से प्रस्तुत किया है। लाजवाब! साधुवाद!
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    सादर!--ब्रजेन्द्रनाथ

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