बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

अलबेली तिजोरी ...


वो पावन सी समिधा 
वो हवन की सुगंध 
मंत्रो का सान्निध्य 
झिझकते हुए कदम 
अजनबी सी निगाहें 
एक छोटा सा लम्हा 
एक शोख सा रंग 
एक बंधी हुई चुटकी 
और धूसर सी मांग 
पर चमकती  लाली 
शुक्र तारे को परे हटा 
सूर्य किरणों ने ली 
सपनीली सी अँगड़ाई  …

महावर की ललछौंही चमक 
बिछिये की श्वेत शीतलता 
चूनर में झिलमिलाते 
स्वपनिल  सितारे 
दो जुड़े हाथों ने 
सहेज ली अरमानों सजी 
ईश्वरीय सौगातों से भरी 
अपनी अलबेली तिजोरी  ... निवेदिता 

15 टिप्‍पणियां:

  1. परिवर्तन ........ शाश्वत :)
    प्यारी सी रचना...

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  2. कितने सुंदर एहसासों की माला पिरोयी है आपने ...!!ईश्वरीय सी ....बहुत सुंदर रचना !!बधाई !!

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  3. बाप रे!!! ये कविता है या पेंटिंग!! पढ़ते हुए राग भैरवी के सुर बजने लगे कानों में। बहुत सुन्दर।

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  4. शुक्र तारे को परे हटा
    सूर्य किरणों ने ली
    सपनीली सी अँगड़ाई …

    वाह...सुन्दर बिम्ब....
    अनु

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  5. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन किस रूप मे याद रखा जाएगा जंतर मंतर को मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  6. बहुत ही गहरे और सुन्दर भावो को रचना में सजाया है आपने.....

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  7. क्या खूबी सहेजी तिजोरी अरमानों की !
    बहुत खूब !

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  8. बड़े ही प्यारे ढंग से सजायी है स्मृतियों की श्रंखला

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