रविवार, 2 दिसंबर 2012

बोलते स्वर !

अनहत नाद से 
अनसुने स्वर 
बसेरा बनाये 
हमारे बीच 
ये भी घण्टी से 
झंकृत हो 
बोल सकते हैं 
बस हमको 
बनना होगा 
खामोश पड़ी 
घण्टी के 
मन के द्वार 
खोलते और 
बोलते स्वर !
      -निवेदिता 

14 टिप्‍पणियां:

  1. प्लानिंग तो हो गयी अब अमल कब शुरु होगा ? :)

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  2. मन के द्वार खोलिए और सुनने दीजिये मन की आवाज़ .... अच्छी प्रस्तुति ...

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  4. हर के डमरू से उत्पन्न इस स्पंदन को सुनने के लिए मन के द्वार ही खोलने होगे .

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  5. हर ध्वनि सुनने की शक्ति बढ़ती जा रही है।

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  6. खामोश पड़ी घंटी के मन के द्वार ...
    बिम्ब ने भी मन मोहा !

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  7. खामोश पड़ी
    घण्टी के
    मन के द्वार
    खोलते और
    बोलते स्वर !

    अनहद ले जाता निश्चय ही ...उस पार .....
    भक्ति और शक्ति का सम्मिश्रण ....
    सुंदर विचार ...
    शुभकामनायें ....

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  8. बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी.बेह्तरीन अभिव्यक्ति .शुभकामनायें.


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  9. होते हैं अनुगूंज के भी स्वर :-)

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  10. बहुत ही सुन्दर कविता आभार निवेदिता जी |
    समय हो तो अपने समय के महान कवि हरिवंश राय बच्चन जी को पढने का कष्ट करें
    www.sunaharikalamse.blogspot.com

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  11. एक छोटी से कहानी वो यथार्थ कह रही है कि अगर अपने सिद्धांत और रूचि के रस्ते पर अकेले चलाना है तो अकेले ही चलाना होगा क्योंकि इसा समाज और जाती की भीड़ में अपनी सी कुछ ही मिलेंगी लेकिन अगर शक्ति का अहसास अपने में एक ही हैं

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  12. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल 4/12/12को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका स्वागत है

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  13. द्वार तो मन के खोने होते हैं कुछ भी सुनने को ... उसे पहचान देने को ...

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