शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

क्या शगुन क्या अपशगुन .....

किसी की राह देखी 
कही नजरें बिछायीं 
क्यों कहीं राह में देख 
कैसे हैं नजरें बचाईं 
सुगंध और सुमन से 
दोनों है सजे संवरे 
एक जीवंत उमंग 
दूजी निर्जीव तरंग 
एक पिया संग चली 
दूजी पिया से है जली 
एक नया घर बसाने चली 
दूजी बसा घर छोड़ चली 
एक नये जहाँ में चली 
दूजी इस जहाँ से चली 
दोनों ही साए एक से 
कैसे कहूँ कौन सा रंग 
सजाये शगुन सा 
कौन कर जाए धूमिल 
सब रंग .........
            -निवेदिता 

11 टिप्‍पणियां:

  1. इत्ती गंभीर बातें तो आप चुटकियों में कह जाती हो . शगुन अपशगुन हमारे मन की भ्रान्ति है बस. एक ही बात किसी के लिए शगुन तो किसी के लिए अपशगुन.

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  2. वाह....
    बहुत सुन्दर ....

    सस्नेह
    अनु

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  3. बेहद गहन अभिव्यक्ति निवेदिता जी

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  4. हृदयस्पर्शी भावपूर्ण प्रस्तुति.

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  5. मन की राहें स्वस्थ रहे तो शगुन प्रतिपल।

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  6. कैसे कहूँ कौन सा रंग
    सजाये शगुन सा
    कौन कर जाए धूमिल
    सब रंग .........

    वाह बहुत अच्छी अभिव्यक्ति,,,,
    RECENT POST:....आई दिवाली,,,100 वीं पोस्ट,

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  7. मन से मन और दिल से दिल मिले तो ही बात बनती हैं ..शगुन , अपशगुन तो एक मन का भरम है ..बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति!

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  8. बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती रचना ...बहुत खूब



    दीवाली की बहुत बहुत शुभकामनाएँ

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  9. एक जीवंत उमंग
    दूजी निर्जीव तरंग
    एक पिया संग चली
    दूजी पिया से है जली......... अत्यंत भावपूर्ण....

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