शनिवार, 7 जनवरी 2012

"टोल-टैक्स"


 सडक धुंध का नकाब ओढ़े हुए ,
जैसे ज़िन्दगी ने चलते-चलते
सबकी निगाहों से खुद को छुपा
आते-जाते खुद  को ही काटती
दोराहों और चौराहों में बांटती
गति-अवरोधकों की ठोकरों में
लम्हों के खोये जवाब तलाशती ,
कभी दिखाई देते थे जो फुटपाथ
अब वो भी बिचारे यूं ही बन गये
शिकार अपनों के अतिक्रमण का ..
कभी अचानक मन्दिर उग आया
कहीं नागफनी ने भी जड़ें जमा ली
जीवन के आते-जाते दायित्व
अक्सर याद दिला जातें हैं
"टोल-टैक्स"की  !!!!!!!!!!!!
                        -निवेदिता

29 टिप्‍पणियां:

  1. एक सम्पूर्ण पोस्ट और रचना!
    यही विशे्षता तो आपकी अलग से पहचान बनाती है!

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  2. जीवन के आते-जाते दायित्व
    अक्सर याद दिला जातें हैं
    "टोल-टैक्स"की !!!!!!!!!!!!
    कमाल की बात कही है

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  3. कल 09/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  4. नूतन अंदाज़ कमाल की ..अच्छी लगी

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  5. बढ़िया प्रस्तुति...
    आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 09-01-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  6. हर घटना अपना टैक्स माँगती है, जीवन ऐसी ही बढ़ती है।

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  7. वाह ...बहुत खूब कहा है आपने ।

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  8. खूबसूरत ख्यलाभिवयक्ति...!
    जिंदगी जाने अनजाने में इम्तिहान लेती है मगर बेहिसाब सवाल नहीं करती...!

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  9. निवेदिता जी,..सुंदर अभिव्यक्ति बढ़िया रचना,....बेहतरीन,...
    welcom to--"काव्यान्जलि"--

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  10. मै फालोवर बन रहा हूँ आप भी बने तो मुझे हार्दिक खुशी होगी,...

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  11. बड़ी गहरी बात है इस कविता में तो।

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