मंगलवार, 3 जनवरी 2012

चाहत ........




हाथों की 
लकीर बनाओ 
या अपनी 
किस्मत की रेखा 
बस रखना प्रिय 
अपने हथेली की 
सहज छाँव में !




चाहे जो बनो 
सुलझी उलझन 
या फिर 
उलझी उलझन 
पर बनो 
सिर्फ मेरी ही 
मेरी अपनी 
सपनीली उलझन !




शायद चाहत 
कुछ अधिक है 
तुमसे तुमको ही 
चुरा लाने की 
पर अपनी तो  
यही चाहत है 
कुछ यूँ ही हर हद
बेखुदी में तोड़ जाने की !
                -निवेदिता  

19 टिप्‍पणियां:

  1. इसी चाहत में मन की उथलपुथल के साथ जी लेता है इन्सान

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  2. चाहतों का सुनहरा संसार ...हथेली में

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  3. चाहे जो बनो
    सुलझी उलझन
    या फिर
    उलझी उलझन
    पर बनो
    सिर्फ मेरी ही
    मेरी अपनी
    सपनीली उलझन !


    Wah!! Wah!!!

    Bahut khoob...

    www.poeticprakash.com

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  4. सुंदर प्रस्‍तुति।
    गहरे अहसास।

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  5. शब्द शब्द बेजोड़ रचना...बधाई
    नीरज

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  6. बहुत अच्छी लगी आपकी यह प्रस्तुति.
    शब्द और भावों का अदभुत संगम.
    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

    मेरे ब्लॉग पर आईयेगा,निवेदिता जी.
    हनुमान लीला आपको पसंद आएगी.

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  7. हद को तोड़ जाने की जब हो जाए चाहत,
    तो बस इसी को कहते हैं बेइंतहा मुहब्बत।

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  8. khubsurt rachnaa...
    aur pyari see chahat:)
    hamne bhi hath ke laakiron pe likha hai... ek bar dekhna...!

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  9. बेखुदी की हद को तोडती नज़्म.. बहुत बढ़िया लिखा है...

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  10. हाथों की
    लकीर बनाओ
    या अपनी
    किस्मत की रेखा
    बस रखना प्रिय
    अपने हथेली की
    सहज छाँव में !

    बहुत खुबसूरत अल्फाज़ हैं |

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  11. No words ...... how have you touched feelings of bottom of heart.... Excellent madam...

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  12. क्या मासूम चाहत है। वाह! :)

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