शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

फ़ूल हूं खुश्बू नहीं.......

फ़ूल हूं खुशबू नहीं
जो महक कर उड़ जाऊं
कहीं ठहर न पाऊं !
काश कि  होती काटां ही
चुभन ही सही कुछ तो दे जाती
टीस बन के कभी याद आ जाती !
फ़ूल ही जब हूंमैं
कैसे कहूं बिखर भी न पाऊंगी
अगर बिखरी तो कीच में मिल जाउंगी !
बिखरने से भी क्या फ़र्क है
बिखरना है तो जरूर बिखरुंगी
बिखर के भी सॄजन कुछ कर जाउंगी !
फ़ूल हूं तो फ़ूल की तक़्दीर
बिखर के पहुंचू शायद अभीष्ट तक
खिले हुए न पहुंच सकी तो क्या !
फ़ूल की भी क्या किस्मत
ग़र पा सका न जगह सेहरे में
क्या ख़ुद का मज़ार भी देगा उसे ठुकरा ?

7 टिप्‍पणियां:

  1. कश्मकश को सुन्दर अभिव्यक्ति दी है.

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  2. कल 30/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. khoobsurat rachna, khoobsurat Abhivyakti.
    http://neelamkahsaas.blogspot.com/2011/09/blog-post.html

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