बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

उधार बाकी है ...

उधार बाकी है ...

ज़िन्दगी थोड़ी मोहलत मुझे दे दे
इस ज़िन्दगी का कुछ उधार बाकी है

नयन नम हो गए ,स्वप्न भी झर गये
नयनों में सपनों का उधार बाकी है

साँसें भी थक चली ,पग भी थम गये
मंजिल का उधार अभी बाकी है

*तन* तो मिट्टी हुआ भस्म यूँ बन गया
एक पेड़ का उधार अभी बाकी है
 ... निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सही कहा, पेडों का उधार तो मनुष्य नहीं चुका पायेगा.
    रामराम

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 20.02.2020 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3617 में दिया जाएगा| आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी|

    धन्यवाद

    दिलबागसिंह विर्क

    जवाब देंहटाएं
  3. मनुष्य पैदा होने के बाद अंत समय तक बहुत कुछ बाकी रहता है

    जवाब देंहटाएं
  4. नमस्ते,

    आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में शुक्रवार 21 फरवरी 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  5. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं

  6. *तन* तो मिट्टी हुआ भस्म यूँ बन गया
    एक पेड़ का उधार अभी बाकी है

    बहुत ही सुंदर ,तन के मिट्टी होने के बाद भी एक पेड़ का उधार तो बाकी ही रह जाता हैं ,बेहद गहरे भाव ,सादर नमन आपको

    जवाब देंहटाएं