रविवार, 15 दिसंबर 2019

लघुकथा : सन्तुलन धड़कनों का


लघुकथा :  सन्तुलन धड़कनों का

दिल अपनी ही तरंग में झूमता अपनी मनमर्जी कर रहा था ... कभी बिना बात ही गुनगुना कर थिरकने लगता ,तो कभी रहस्यमयी चुप्पी ओढ़ लेता । अपने किसी भी काम के बारे में न तो उसको करने के पहले सोचता था ,और न ही बाद में ।

दिमाग दिल की इन हरकतों से बहुत परेशान हो जाता । अक्सर वह दिल को दिमाग की ( अपनी ) समझाइश की परिधि में लाने का प्रयास करता ... परन्तु परिणाम तो वही ढ़ाक के तीन पात सा होता ।

दिल और दिमाग की इस रस्साकशी में धड़कनें बेकाबू होने लगती । अपनी हाँफती साँसों को सम्हालने का प्रयास करते उन दोनों को समझाने का प्रयास करती थी ,परन्तु  ...

दिल दिमाग की बात न मानते हुए अपने दर्द की अनदेखी करते हुए ,प्रत्येक प्रकार की मनमर्जियाँ करता हुआ दर्द के चरम पर पहुँच गया था । दिमाग ने एक बार फिर दिल को समझाते हुए अनुशासन की लगाम बड़ी ही मजबूती से अपने हाथों  में थाम ली थी ,परन्तु इस कठोरता से दिल बेचैन होने लगा और उसकी धड़कन डूबती सी लगी ।

दिल और दिमाग के इस द्वन्द में धड़कनों की हलचल डूबने सी लगीं ,मानो वह कह रही हों ,"काश .... काश तुम दोनों ने एक - दूसरे की बातों और क्षमताओं को समझ कर तालमेल बैठा लिया होता ,तब मुझको इस तरह से दम घुटने की पीड़ा नहीं सहनी पड़ती ... ।"
                .... निवेदिता श्रीवास्तव "निवी"

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (17-12-2019) को    "मन ही तो है"   (चर्चा अंक-3552)   पर भी होगी। 
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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