सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

एक सुराख ......



बेसबब
यूँ ही सी
एक चाहत
ने सरगोशी की
आज
अपनी सारी
उलझनों
या कह लूँ
दुश्वारियों को
समेट कर
सहेज लेती हूँ
अपने ही
पोशाक की
दराजों (जेबों) में
बस तू इतनी ही
रहमत बरसाना
उन दराजों में
अपनी नियामत का
एक सुराख बना देना  ..... निवेदिता 

4 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " डरो ... कि डरना जरूरी है ... " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. प्रार्थना की काव्यात्मक अभिव्यक्ति अच्छी लगी ।

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  3. कभी छुटकी के ब्लॉग पर भी आना :)

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