गुरुवार, 1 मई 2014

तुम .... तुम .... बस तुम .....


यादें तुम्हारी सावन सी 
कितना भी हटाओ 
जातीं ही नहीं !

बातें तुम्हारी मिश्री सी 
जब भी सुनूँ 
रसभरी लगे !

अनबन तुमसे माखन सी 
यादों की धड़कन में 
अटक नहीं पाती !

साथ तुम्हारा शमी (वृक्ष) सा 
ज़िंदगी की धूप 
इन्द्रधनुषी लगे !

तुम थे तुम ही हो 
यादें बस इसी की 
सलोनी लगे !

लम्हे साथ जो बिताये 
हर रंग की रंगत संजोये 
श्वेतमना सजे ! 
           निवेदिता …… 

20 टिप्‍पणियां:

  1. साथ तुम्हारा शमी (वृक्ष) सा
    ज़िंदगी की धूप
    इन्द्रधनुषी लगे !

    प्यारी सी पंक्ति , कुछ अपनी सी .......... बेहतरीन तो लिखते ही हो :)

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  2. बेहद बेहतरीन रचना ..वाह कितनी बारिक नजर और अहसास को आपने शब्दों का जामा पहनाया है... उम्दा

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  3. कोमल भावो की अभिवयक्ति......

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  4. मधुर-मधुर रस बरस रहा है :)

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (02-05-2014) को "क्यों गाती हो कोयल" (चर्चा मंच-1600) में अद्यतन लिंक पर भी है!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. बातें तुम्हारी मिश्री सी
    जब भी सुनूँ
    रसभरी लगे !

    So beautiful !!! ye aappar bhi laagu hota hai bhabhi !!!

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  7. यादें तुम्हारी सावन सी
    कितना भी हटाओ
    जातीं ही नहीं .....बहुत खूब !!

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  8. भावमय करते शब्‍दों का संगम ........

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  9. कल 04/05/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  10. स्मृतियाँ हृदय को पोषित करती रहें।

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  11. भुत खूब ... मन में बंधी रहती हैं बीती बातें खुशबू की तरह ...

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  12. तुम थे तुम ही हो
    यादें बस इसी की
    सलोनी लगे
    सुन्दर रचना

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  13. यह छाया यह खुशबू, यह माखन यह मिस्री, सदा आपके जीवन में यूं ही प्रेम रंग बरसाती रहे। :) शुभकामनायें

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