शनिवार, 26 अक्तूबर 2013

वो एक लम्हा कुंती के जीवन का ........



कुंती का नाम आते ही मुझे उसके जीवन का बस एक लम्हा याद आ जाता है जो अजीब सी वेदना भरी घुटन दे जाता है और उस लम्हे में कुंती एक आम सी स्त्री लगती है .....

कर्ण के जन्म के बाद ( यहाँ मैं चर्चा  बिलकुल  नहीं करूंगी कि किन परिस्थितियों में कर्ण का जन्म हुआ , उन घटनाओं की किसी भी  ऐतिहासिकता  अथवा  किवदंतियों  के विषय में बिलकुल भी नहीं ) , जब एक राजपुत्री की तथाकथित मर्यादा निबाहने के लिए , कुंती को कर्ण का परित्याग करना पड़ा ........ सिर्फ इस एक पल ने ही कुंती के  सम्पूर्ण जीवन को एक डगमगाती लहर बना दिया ...... मैं तो उस लम्हे के बारे में सोच कर भी संत्रस्त हो जाती हूँ कि कैसे  एक  माँ  ने अपने ही हाथों , अपनी आत्मा के , अपने शरीर के अंश को उन विक्षिप्त लहरों के हवाले किया होगा ....... कई पुस्तकों में पढ़ा  तो  मैंने  भी है कि उस   टोकरेनुमा नाव को बेहद  सुविधाजनक और सुरक्षित  बनाया  गया था साथ  ही उसमें इतनी प्रचुर मात्रा में धन भी रखा दिया गया था जिससे उस शिशु के पालन - पोषण में ,उसको पाने वाले को असुविधा न हो ...... परन्तु क्या कोई भी सुविधा इतनी सुविधाजनक हो सकती है जो माँ के अंचल की ऊष्मा दे सकती है ..... जिस  पल कुंती के स्पर्श की परिधि से वह नौका विलग हुई होगी ,कुंती ने अपने राजपुत्री होने का दंश अपने सम्पूर्ण अस्तित्व पर अनुभव किया होगा .....

पाण्डु से विवाह के बाद भी , जब कुंती ने अपने अन्य पुत्रों को जन्म भी उसी तथाकथित दैवीय अनुकंपा द्वारा ही दिया होगा , तब भी कर्ण अस्पृश्य ही रहा ...... सम्भवत: इस बार कुंती ने एक राजवधु होने का धर्म निभाया होगा ...... 

कर्ण को उसकी अपनी पहचान मिलने का मूल कारण महाभारत का युद्ध ही था ...... बेशक इस युद्ध ने अनेकों वीर योद्धाओं का और कई राज - वंश , का समूल विनाश कर दिया , पर कर्ण को "एक दानवीर योद्धा कर्ण" के रूप में पहचान भी दे गया ....

अगर ये व्यथित करने वाला लम्हा ,  कुंती  के  जीवन   में  न  आया  होता तो   सम्भवत : वह विवाह  के बाद हस्तिनापुर की उलझी हुई परिस्थितियों को अपेक्षाकृत अधिक संतुलित कर सकती थी । कुंती   ने अपने जीवन की हर सांस एक अपराधबोध के साथ ली ... पहले तो कर्ण को अपनी पहचान न दे सकने की और बाद में शेष पाण्डवों के जीवन के अभय वरदान के फलस्वरूप कर्ण के जीवन के लिए अनेकानेक  प्रश्नचिन्ह बना देने के लिए ..... काश वो अनचाहा सा लम्हा  कुंती के  जीवन में न आता और अगर उस लम्हे को आना ही था तो कुंती  को एक राजकन्या एवं राजवधू नहीं होना था ......
                                                                  - निवेदिता 

16 टिप्‍पणियां:

  1. कुंती से शुरू हुयी बात द्रोपदी तक कैसे जा पहुँची ?

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    1. त्रुटी इंगित करने के लिए आभार ... अब ठीक कर दिया है

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    2. तो यह गलती थी ? बड़ी मासूम सी थी :-)

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  2. karn par ek katha likh raha hoo . aapke paas jo jaankaari hai , use share kariyenga .
    dhanywaad.

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    1. कर्ण पर मैंने पहले भी एक आलेख लिखा था इस ब्लॉग में ही देख लीजिएगा ,कर्ण के विषय में कैसी जानकारी चाहते हैं ...... धन्यवाद !

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  3. कुंती का जीवन विसंगतियों से भरा रहा , वो राजमाता और माता होने के वैचारिक द्वन्द के बीच झूलती रही .

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  4. कुंती ने जब कर्ण का त्याग किया तब भय प्रबल था
    पर कुंती की क्षमता को जब पांडू ने जाना तब वक़्त था इस सत्य को कहने का
    जगजाहिर था कि भीष्म इस बात को जानते थे
    जिस कुल में धृतराष्ट्र,पांडू,विदुर थे - वहाँ इसे मौन दर्द बनाने का प्रश्न नहीं था
    और यदि था तो कर्ण को शूल चुभोते वरदान की चाह - क्या माँ का धर्म था?
    क्या माँ की वेदना यहाँ स्वार्थी नहीं हुई ……………

    दर्द की अनुभूति अलग-अलग होती है …
    किसी के दर्द के आगे पैसा और मान-सम्मान महत्वपूर्ण होता है
    किसी के आगे बच्चे का भावी जीवन,उसका सम्मान !
    समाज का तर्क भी हास्यास्पद है
    जिस समाज के आगे आप चीख लेते हैं
    पैसे के लिए बँटवारा कर लेते हैं
    भर्त्सना खुलेआम करते हैं
    वहाँ 'स्वत्व' के लिए कैसी दुविधा ???

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  5. बहुत कुछ खोना होता है सार्वजनिक जीवन में आने के बाद ... शायद यही कठिन तपस्या है जिसको राजधर्म कहा जाता है ...

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  6. कर्ण दानी क्यों बने ...इस पर भी लिखे ..मेरे भी ब्लोग आये

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  7. आपकी इस प्रस्तुति को आज की बुलेटिन शहीद जतिन नाथ दास और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  8. परिस्थितियों से बिंधे दो व्यक्तित्व, ममता और शौर्य के प्रतिरूप।

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  9. Mahabharat ki sabse badi visheshata yah hai ki isme KAASH ki koi gunjaaish nahin... ye hamara banaya shabd hai Parmatma ke kritya mein dakhal dene ke liye.. Hamein yah maanana chahiye ki jisne is jagat ki katha pahle se likh rakhi hai usne sabhi pahloo par vichar kiya hoga..
    Jis tokri me Karn jaisi daulat thi wahan sone chaandi maati thay.. Radha janti hai ki use kya mila.. Kahte hain bina janm diye uski chhati me doodh utar aaya tha.. Ab vidhata ka likha dekhiye.. Maa to maa hai... Kunti na sahi Radha sahi..

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  10. पिछले २ सालों की तरह इस साल भी ब्लॉग बुलेटिन पर रश्मि प्रभा जी प्रस्तुत कर रही है अवलोकन २०१३ !!
    कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०१३ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !
    ब्लॉग बुलेटिन के इस खास संस्करण के अंतर्गत आज की बुलेटिन प्रतिभाओं की कमी नहीं 2013 (15) मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  11. परिस्थिति क्या न करवाए .........

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