रविवार, 2 जून 2013

रिश्ते और ऑरथराइटिस




जब भी कोई कष्ट में चलता दिखता है ,तो सबसे पहला ख़याल यही आता है दिक्कत तो इस बंदे के जोड़ों में ही होगी । इसका एकमात्र कारण यही है कि कोई भी परेशानी हमारे सबसे कमजोर पलों में ही हावी हो पाती है और कोई भी बीमारी शरीर के दुर्बल होते अंगों पर ही अपना असर दिखा पाती है । मुझे लगता है कि जहाँ हम खुद को बहुत सामर्थ्यवान समझते हैं वहीं हम सबसे ज्यादा कमजोर भी होते हैं । सुपर इंजीनियर जिसको हम ईश्वर कहते हैं ,ने कितने सारे जोड़ लगा कर हमारे शरीर को एक दृढ़ता प्रदान की है पर हम अपनी गलत जीवन - शैली से उसमें भी दरारें पैदा कर लेते हैं और मजबूती देने वाले जोड़ हादसों को दावत दे जाते हैं । इन दरारों के होने का कारण कभी तरलता की न्यूनता बताई जाती है तो कभी अस्थि - मज्जा की शिथिलता और एक नाम इस बीमारी को मिल जाता है "ऑरथराइटिस " का । डाक्टर और फ़िजियो दोनों ही यही कहते हैं कि  इसका कोई इलाज नहीं है इसलिए ये बीमारी नहीं है ,पर ये जाती नहीं इसलिए लाइलाज बीमारी है । इसका इलाज सिर्फ यही है कि  सावधानी रखी जाए कुछ व्यायाम करें ,वजन कम करें .... इत्यादि ।   

रिश्ते हर लम्हे जाने - अनजाने में हमारे साथ रहते हैं ,कभी खुशी देते तो कभी गम । ये रिश्ते ही हैं जो भीड़ में भी तन्हा कर जाते हैं और तन्हाई में भी जीवन भर देते हैं । जिन रिश्तों पर हमें खुद से भी ज्यादा भरोसा होता है वो भी यूँ ही कभी बेबात बिखर जाते हैं । शायद रिश्तों को जीवंत रखने के लिए हमको एक नट का सा ही संतुलन बनाये रखना चाहिए । मुझे तो लगता है कि रिश्ते और ऑरथराइटिस दोनों में बहुत समानता है । दोनों ही हमको अपनी महत्ता का एहसास तब करा ही जाते हैं ,जब भी हम उनको अपनी सुविधा और इच्छानुसार अनदेखा कर देते हैं । 

रिश्तों को भी छोड़ा नहीं जा सकता और शरीर को भी नहीं और दोनों को बचाए रखने का एक ही तरीका है कि अपने हाव-भाव और अपनी मुद्रा ठीक रखें । ऑरथराइटिस से बचने के लिए मुद्रा अर्थात अपने उठने-बैठने का तरीका  , जैसी हमारी संरचना हुई है वैसी रखें । पीठ सीधी रखते हुए और घुटनों का ध्यान रखते सहज भाव से बैठे । रिश्तों को बनाये रखने के लिए अपनी सोच का संतुलन साधने की आवश्यकता होती है । इस तथ्य को तो प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि न तो हमारी प्रत्येक बात या आदत किसी को पसंद आ सकती है और न ही हमको किसी की । यहाँ बस इतना ही करना है कि उस रिश्ते की प्राथमिकता निर्धारण हमको स्वयं ही करना  है । अपनी सोच को इतना दृढ़ करना होगा कि जिन रिश्तों के बिना हम को अपना जीवन बेमकसद लगे ,उन की न अच्छी लगने वाली बातों को अनदेखा कर सकें । 

ऑरथराइटिस और रिश्ते दोनों एक जैसी सजगता चाहते हैं । पर इन दोनों में एक नाज़ुक सा अंतर भी है । ऑरथराइटिस में विकृति ( कष्ट ) को अनदेखा नहीं करना चाहिए ,परन्तु रिश्तों को बनाये रखने के लिए विकारों को कभी - कभी अनदेखा करना होगा । 

22 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज सोमवार (03-06-2013) को फिर वोही गुज़ारिश :चर्चा मंच 1264 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. निवेदिता जी साम्यता सुन्दर बन पड़ी है ,ऑरथराइटिस और रिश्ते दोनों एक जैसी सजगता की आवश्यकता है .सुन्दर नयी सोच .मंजुल भटनागर

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  3. वाह...रिश्ते और ऑरथराइटिस का इतना सुन्दर कम्पैरिसन तो सोचे ही नहीं थे...बहुत सही बात!!

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  4. सच कहा, संबंधों को सदा ही इसी तरह ख्याल करना पड़ता है।

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  5. बेहद प्रभावशाली , खासकर आन्तिम पंक्तियाँ ।

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  6. बहुत बेहतरीन .सुंदर पोस्ट।

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  7. बहुत सुंदर और सार्थक ...

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  8. aapki batton se sahmat hoon nivedita jee.....umra badhne ke sath-sath jahan sharir kamjor padne lagta hai wahin riste majboot hone shuru ho jana chahiye ......

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  9. सच कहा दोनों ही सावधानी मांगते हैं.

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  10. आन्तिम पंक्तियाँ बहुत सही....!

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  11. कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-निवेदिता जी

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  12. बहुत अच्छी और सच्ची बात.....
    रिश्ते और आर्थराइटिस दोनों ही एक बार बिगड़े तो सुधार नामुमकिन....

    सस्नेह
    अनु

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  13. सच कहा ख्याल तो खुद ही रखना होता है फिर चाहे सेहत हो या रिश्ते ...

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  14. ब्लॉग बुलेटिन की ५५० वीं बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन की 550 वीं पोस्ट = कमाल है न मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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