गुरुवार, 21 जून 2012

रिश्तों का निर्वहन कर लें ....


कुछ अक्षर जैसे शिरोरेखा में हो सिमटे  
चंद आधे-अधूरे शब्द , जैसे हो मन्त्रों का शोर 
कुछ रस्में ,कुछ कसमें ,जाने कैसी रवायतें 
ज़िन्दगी शुरू करने से पहले ही लगा दीं गाँठे
पहले से ही लग चुकी कई अबूझ गाँठों पर 
नामालूम सी अजनबीयत की गाँठ और लगा लें 
आज फिर एक बार उन बोझिल परम्पराओं का 
नवीनीकरण कर लें ,जो कसमें ली रस्मों के तले 
उन रिश्तों का निर्वहन कर लें ......
                                         -निवेदिता 

26 टिप्‍पणियां:

  1. आज फिर एक बार उन बोझिल परम्पराओं का नवीनीकरण कर लें ,
    जो कसमें ली रस्मों के तले उन रिश्तों का निर्वहन कर लें ....

    काश की ऐसा हो जाए ... आमीन ....

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  2. बहुत सुन्दर निवेदिता जी.....
    बहुत सुन्दर............................................

    अनु

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  3. बहुत सुन्दर निवेदिता जी.....

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  4. आयो रिश्तों की डोर को ...विश्वास से और मजबूत कर ले

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  5. समय समय पर रिश्तों में ऊर्जा लगानी पड़ती है..

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  6. बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति...
    सुन्दर रचना...
    :-)

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  7. रिश्ते बस निर्वहन करने भर ही रह गये हैं..बेहतरीन प्रस्तुति...

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  8. यह हो यही ज़रूरी है ,, परिवर्तन!

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  9. आज फिर एक बार उन बोझिल परम्पराओं का
    नवीनीकरण कर लें ,जो कसमें ली रस्मों के तले
    उन रिश्तों का निर्वहन कर लें ......

    भावों की सुंदर प्रस्तुति

    MY RECENT POST:...काव्यान्जलि ...: यह स्वर्ण पंछी था कभी...

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  10. बहुत ही सुन्दर भावाभिव्यक्ति!

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  11. उत्तर
    1. दी ! आपका आना बहुत अच्छा लगता है ....आपके आशीष मिलने जैसा ..-:)

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  12. नवीनीकरण अवश्यम्भावी है, चाहे रिश्ते हों या जिन्दगी... सुन्दर रचना, बधाई.

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  13. भावमय करते शब्‍दों का संगम ...

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  14. सब चाहते हैं यह हो मगर अफसोस की बस यही नहीं हो रहा है आज कल...भावपूर्ण अभिव्यक्ति...

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  15. बहुत बेहतरीन रचना....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  16. अब रिश्ते जुडेंगे तो गांठ तो लगेगी ही । जितनी पक्की गांठ उतना पक्का रिश्ता । फिर रिस्ते मजबूत रहेंगे ।
    सुंदर भावपूर्ण प्रस्तुति ।

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  17. रिश्तों में अजनबियत की गांठ, कहाँ जाए कोई?

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  18. रस्मों की गांठ...
    वाह,
    प्रभावशाली कविता।

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