शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

वो दो हाथों में.....

 वो दो हाथों में हंसती आती ज़िन्दगी ,
 वो दो हाथों में बिखरती जाती ज़िन्दगी ,
वो किलकते हाथ खोजते नये अर्थों में ज़िन्दगी ,
वो सहमते हाथों की कोशिश बचाने को ज़िन्दगी  ,
वो एक रिश्ते का जुडना और निखरती कई ज़िन्दगी ,
वो एक सांस का थमना और बिखरती कई ज़िन्दगी  ,
देते कई शुभकामनायें और शुरू होती ज़िन्दगी ,
देते संवेदनायें और बिखरती जाती ज़िन्दगी..........

4 टिप्‍पणियां:

  1. ज़िन्दगी का सच सुन्दरता से पिरोया है।

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  2. वन्दना जी एवम अनुपमा पाठक जी बहुत बहुत धन्यवाद।

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  3. सूक्ष्म पर बेहद प्रभावशाली कविता...सुंदर अभिव्यक्ति..प्रस्तुति के लिए आभार जी

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