सोमवार, 25 सितंबर 2017

पूरा हो जाये एक चक्र ......

अपलक निहार रही हूँ 
एक बाती है नन्ही सी
कभी दायें तो कभी बाएं 
लड़खड़ा कर भी 
जलती ही जा रही है 
उसके कदमों को थामे है
एक काँप जाती सी लौ
शायद अगले ही पल
दम घुट जाये और
सांसों से आजाद हो जाए
वो डगमगाती नन्ही सी बाती
और पूरा हो जाये एक चक्र ...... निवेदिता




10 टिप्‍पणियां:

  1. दिनांक 26/09/2017 को...
    आप की रचना का लिंक होगा...
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी इस चर्चा में सादर आमंत्रित हैं...

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 101वीं जयंती : पंडित दीनदयाल उपाध्याय और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  3. शायद अगले ही पल
    दम घुट जाये और
    सांसों से आजाद हो जाए
    वो डगमगाती नन्ही सी बाती
    और पूरा हो जाये एक चक्र .....

    Wahhh। बहुत महीन और ज़हीन रचनात्मकता। सुंदर

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  4. बाती के माध्यम से क्षण भंगुर जीवन की बहुत गहन अभिव्यक्ति !

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  5. ये आशा की लो है डगमगाए पर बुझेगी नहीं ... चक्र पूरा होगा ...

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  6. बाती ही तो जलकर प्रकाश फैलाती है... दीप वही रहता है,जली बाती को निकालकर बदल दिया जाता है । अंतिम साँस तक लड़ती है बाती अँधेरे से.....

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