रविवार, 24 सितंबर 2017

दीवारें ........





दीवारों की भी कई किस्में होती हैं 
दीवारें खींचती हैं कुछ रेखायें
इधर सोना है तो उधर खाना खाना 
इस तरफ चप्पलें रखना 
पर हाँ उस तरफ बिल्कुल न ले जाना 
चलो इस छोटी रेखा के इधर पूजा कर लूँगी मैं
तुम उस बड़ीवाली रेखा के पार दोस्तों को बैठाना
सपनों सी होती हैं ये दीवारें
कभी अपनों सा समेट लेतीं हैं
कभी बेगानों सा दूर ढ़केल देतीं हैं
ये दीवारें सच बड़ी दिलफ़रेब होती हैं
..... निवेदिता

7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (25-09-2017) को
    "माता के नवरात्र" (चर्चा अंक 2738)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, सौ सुनार की एक लौहार की “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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