बात में ही कोई बात होगी यूँ न साँसे अटक पाएंगी सवाल करती साँसे भी एक पल को ही सही कहीं अटकी तो कहीं भटक भी गईं होंगी मुझे देखो न अब क्या करूँ बड़ी ही ईमानदार से की थी एक कोशिश याद करने की कुरआन की वो आयतें पर तुम याद आ गये और ....... मैं तो बस मर ही मिटी ..... निवेदिता
वो ही खुदा है तो किसी आयत की क्या जरूरत ...
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