रविवार, 1 नवंबर 2015

रश्मि रविजा ---- "काँच के शामियाने"



रश्मि रविजा के उपन्यास "काँच के शामियाने" को कई बार पढ़ गयी  .......   पहली बार के पढ़ने में ही रेशमी धागों की छुवन का एहसास जाग गया था  .......... . एक ऐसे रेशमी छुवन का एहसास जो अपने रचनात्मक प्रवीणता से सहज ही गतिमान रखता है ,फिसलाता सा  … पर उस के छोर पर एक नामालूम सी गाँठ लगी है ,जो मन को भटकने नहीं देती और कथानक के प्रवाह को एक सतत गति भी देती है  ....

रश्मि ने स्त्री मन के हर पहलू को बड़ी ही नफ़ासत से रचा है  ………  "जया" में अधिकतर स्त्रियों के मन के तार बज उठते हैं  .... न्यूनाधिक रूप से सब में वो समाहित है  … किशोर मन सारे शोख रंग अपने दामन में संजोना चाहता है ,पर सच का दूसरा रूप सामने आने पर कदम लड़खड़ा तो जाते हैं पर जीवन की जिजीवषा विजयी होती है  ....

हर चरित्र अपने अनूठे मनोविज्ञान से आकर्षित भी करता है और प्रश्न भी करता है  ...…. राजीव एक खोखले अहं के साथ जीवन जीता है तो जया तराजू के पलड़ों को साधती धुरी सा  .... पढ़ते हुए जब मन एक अंधियारे खोह सा लगने लगता है तभी संजीव एक प्राण - वायु के झोंके सा मन झंकृत कर जाता है  …

भाषा की बात करूँ तो थोडे से आंचलिक शब्द भी हैं ,पर वो कथन की गति के प्रवाह में सहज ही लगते हैं  .... कई वाक्य तो एकदम से सूत्र वाक्य से लगते हैं ,जो अपनेआप में सम्पूर्ण हैं  ....
१ - क्यारी में आँसुओं से सींचे ,दृढ़ निश्चय का खाद पाकर खिले ये तीन फूल  ( बच्चों के लिए लिखा है )
२ - वो दोनों दो अलग - अलग ध्रुव की तरह हैं 
३ - बच्चे तो गीली मिटटी समान होते हैं 
४ - अधिकार तो किसी घर पर नहीं होता । बस शामियाने से तान दिए जाते हैं सर पर । वो भी काँच के शामियाने जो ज़िंदगी की धूप को संग्रहित कर और भी मन प्राण दग्ध कर जाते हैं । 

रश्मि के लेखकीय कौशल की मैं पहले ही बहुत सराहना करती थी ,पर अब इस उपन्यास को बार - बार पढ़ते हुए उसकी लेखनी का अभिनंदन करना चाहती हूँ  …

रश्मि ने कुछ समय पहले एक बार मझे ये सुझाव भी दिया था कि किताबें पढ़ने के बाद ये लिखूं कि वो मुझ को कैसी लगी  ,तो रश्मि ये काम तुम्हारे उपन्यास के साथ ही पहली बार करने का प्रयास किया है  … अब मेरा ये प्रयास तुमको कैसा लगा ये तो तुम ही बेहतर बताओगी  .... निवेदिता


9 टिप्‍पणियां:

  1. शुरुआत मेरी किताब से ही की ये तो बहुत रोचक हो गया (Y)
    समीक्षा की तो क्या कहूँ , तुम्हारी भाषा तो खुद ही मशल्लाह क्या खूब है ।रेशमी छुअन एन ऑल , मैं तो इसी को बार बार पढ़ रही हूँ ।तुम सबके प्यार से तो अभिभूत हूँ ।
    किताब मंगवाना ,पढ़ना और फिर समीक्षा भी लिख देना , त्यौहार के बीच की व्यस्तता में और सब कुछ अपनी इच्छा से ।क्या कहूँ अब अपनी अमीरी का अहसास हो रहा है ।
    थैंक्स कहना भी छोटा लग रहा है ।
    बस ऐसे ही मेरा उत्साह बढ़ाती रहो :) और हाँ ये सिलसिला रुकना नहीं चाहिए ...किताबों पर लिखना जारी रखो, शुरुआत तो कर ही दी है..ऑल द बेस्ट (Y)

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  2. बहुत बढ़िया समीक्षा है । मानवीय बातों को तरजीह देना ज़रूर है लेखन में । आपने किताब के उन बिन्दुओं का सुंदरता से ज़िक्र किया है ।

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (03-11-2015) को "काश हम भी सम्मान लौटा पाते" (चर्चा अंक 2149) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, ब्लॉग बुलेटिन: प्रधानमंत्री जी के नाम एक दुखियारी भैंस का खुला ख़त , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  5. सुंदर समीक्षा जिसे पढ़कर पुस्तक पढ़े बिना नहीं रह सकते.

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