बुधवार, 11 मार्च 2015

अटकते कदमों का साथ …

मेरे कदमों की 
अबोली सी धड़कन 
साँस - साँस 
अटक जाती हैं 
सामने दिखती मंज़िल 
कदमों को 
निहारती पुकारती हैं 
पर  …
अगर 
ये एक साँस भर भी 
मंज़िल की तरफ 
बहक कर लुब्ध हो जाएंगे 
साथ चलते 
हमक़दम के लडख़ड़ाते कदम 
कहीं अटक कर 
भटक न जाएँ 
चलो  … 
मंज़िल मिले न मिले 
चार कदमों का 
इस सफर में 
दो कदम बन साथ चलना 
मुबारक हो हमकदम के 
अटकते कदमों का साथ  … निवेदिता 

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (13-03-2015) को "नीड़ का निर्माण फिर-फिर..." (चर्चा अंक - 1916) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. दो कदम तुम चलो, दो कदम हम..
    मंजिल फिर एक दूसरे के बनेंगे तुम और हम :)

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  3. इस बार आपसे सुन कर रहेंगे कविता कोई! इतनी सुन्दर कवितायें लिखती हैं आप !

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