गुरुवार, 20 मार्च 2014

संवेदना की वेदना

अभी कुछ दिनों पहले हमारे घर में सफाई का काम करने वाली ,बड़े ही उदास मन से काम कर रही थी,कारण पूछने पर उस की व्यथा  पीड़ित कर गयी  … उसकी पांच साल की अबोध बच्ची अपने ही चाचा के वहशीपन का शिकार होते - होते बची ,जब उसने अपने पति से ये बात कही तो उसने इसको अपने परिवार की बदनामी होने का डर बता अनदेखा करने को कहा ,पर वो बच्ची हर पल अभी भी उसी डर और दहशत के माहौल में घुट रही है  ..... 

एक मन है मेरे पास भी 
जो संवेदनशील है 
इसीलिये वेदना भी 
अनुभव होती है 
तुम्हारा देखना देता है 
एक एहसास सुरक्षा का 
और जैसे ही बदलती हैं 
तुम्हारे निगाहें ,चुभ जाती है 
अस्थिर कर जाती हैं 
तन ही नहीं मन को भी 
जो धागे बांधे थे मैंने तुम्हारी कलाई पर 
एक आस थी एक विश्वास था 
और थी दुआ तुम्हारी सुख - समृद्धि की 
कैसे कहूँ ,उन धागों से ही तो बुनी थी 
अपने माथे को ढँकने को सतरंगी चूनर 
तुम्हारे ही हाथ कैसे बढ़ आये खींचने को 
वो मासूम से नाज़ुक से रेशे 
जो धड़कते थे और सींचते थे 
हमारे नेह के फ़ाख़ताई बंधन को 
ये कौन सा पल आता है जब 
आशीष देते हाथों की नरमाई बदल 
पैमाइश करने लगती है बदन के ताने - बाने की 
हे प्रभु ! अगर तू सच में कहीं है 
बस एक ही काम कर 
या तो मुझसे ये संवेदना की वेदना ले ले 
या फिर उन हाथों की हर पल बदलती मनोवृत्ति को थाम ले 
मैं भी विश्वास कर सकूँ और जी सकूँ  …....... निवेदिता 

13 टिप्‍पणियां:

  1. मर्म को छूते भाव ...संवेदनशील अभिव्यक्ति

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  2. दुखद परिस्थितियाँ, कैसे सम्हलेंगे तब जीवन के तार।

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  3. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (21.03.2014) को "उपवन लगे रिझाने" (चर्चा अंक-1558)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें, वहाँ आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  4. बहुत गहरी और भावनात्मक अभिव्यक्ति। बहुत सुंदर शब्दों का प्रवाह।

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  5. ..सुंदर शब्दों से सजी बेहतरीन प्रस्तुति..होली की शुभकामनाएं


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  6. मर्म को छूते अहिं भाव .. ऐसा कोयन होता है ...

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  7. हे प्रभु ! अगर तू सच में कहीं है
    बस एक ही काम कर
    या तो मुझसे ये संवेदना की वेदना ले ले
    या फिर उन हाथों की हर पल बदलती मनोवृत्ति को थाम ले
    मैं भी विश्वास कर सकूँ और जी सकूँ ...मन को छु गया
    latest post कि आज होली है !

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  8. हे प्रभु ! अगर तू सच में कहीं है
    बस एक काम कर -
    - नारी का देह-तंत्र ऐसा कर दे ,कि नर की मनमानी न चल सके !

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  9. भावनात्मक अभिव्यक्ति बहुत सुंदर.......:)

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  10. सबसे पहले तो देर से आने के लिए माफ़ी दी...:) अब रही रचना की बात! तो वाकई दिल छू गयी आपकी यह रचना प्रतिभा जी की बात से सहमत हूँ सच में काश प्रभु नारी का देह तंत्र ऐसा कर दे की नर की मनमानी न चल सके तब कुछ बात बने...

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  11. ओह्ह्ह्ह..........निवेदिता, सचमुच भरोसा टूटने का क्रम अब निरन्तर है....
    या तो मुझसे ये संवेदना की वेदना ले ले
    या फिर उन हाथों की हर पल बदलती मनोवृत्ति को थाम ले
    मैं भी विश्वास कर सकूँ और जी सकूँ
    पीड़ा छलक रही तुम्हारी, जो हम सबकी भी है..

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  12. Aam Jantaa Itnee Jaldee Bhramit Kyon Ho Jaatee Hai....(Kaam-Vaasnaa)... Man Kee Utpatti Kahee Jaatee Rahee Hai... (Fir, Uprokt Naaree-Tan Ke Badlaab Kaa Prashn Saamne kyon Laayaa Jaa Rahaa Hai?)

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