शनिवार, 21 दिसंबर 2013

मेरे जीवन की अनबोली सी वजह ..........



आज 
बहुत सोचा 
और 
निर्णय लिया 
तुम मुझको 
भूल गये 
चलो मैं भी 
भूल जाती हूँ 
तुमको ..... 
तभी कहीं 
इक जुगनू सा 
चमक गया ....
गर हम
एक - दूसरे को 
यूँ ही 
भूलते रहे  
क्या कभी 
कुछ भी 
मिलेगा 
कभी कहीं 
याद भी करने को 
या कहूँ 
क्यों भूलूँ 
क्योंकि .......
अरे ! तुम 
हाँ , तुम
तुम ही तो हो 
मेरे जीवन की 
अनबोली 
सी वजह ........... निवेदिता 

11 टिप्‍पणियां:

  1. सही निर्णय , भूलने की जरुरत ही क्या है , अनकहे अनबोले भावनाओ से बनी कड़ियाँ भी आंतरिक सम्बल बन जाती है

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  2. जीने की वज़ह को क्या ख़ूबसूरती से डिफाईन किया है!! बहुत प्यारे एहसास!!

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  3. तात्कालिक प्राथमिकतायें तनिक भटक सकती हैं पर प्रेम दृढ़ होता है, धूल हटने पर पुनः चमकने लगता है।

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  4. बेकार का कोशिश - "भूलने की"....? बल्कि अपने-आप को इतना "व्यस्त" रखने का प्रयास - ही बेहतर इलाज

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  5. Kisi ki sundr smritiya jeene ki khubsurat wajah hoti hai....nice bhulne se bhula bhi nhi jata...kuch ahsas dil m is kadar ghar bana lete hai.....nice1

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  6. भूलना आसां भी नहीं तो हां ... और फिर भूलो भी क्यों ...
    पड़ी रहती है एक कोने में ये याद ...

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  7. अरे दी ...भूलना संभव ही नहीं है कभी कुछ नहीं भूलते हम, तभी तो यादें बनी रहती है। जो भूल पाते कुछ तो ज़िंदगी में यादें ही न होती। नहीं ?

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