रविवार, 17 नवंबर 2013

तुम्हारी कुछ भी नहीं ......


ये चाहतें
बड़ी अजीब ही
नहीं
अजीब - अजीब सी
कभी भी
कहीं भी
यूँ ही सी
सरगोशियाँ करने
लग जाती हैं
अब देखो न
कैसी चाहत
उभर आयी है
चाहती हूँ
तुम्हारी कुछ भी
नहीं बनना ...
क्यों ?????
अरे ...
अभी तो
बहुत कुछ
और हाँ
बहुत सारे हैं
तुम्हारे पास
पर
जब कभी
ये सब कहीं
भटक जाएँ
ज़िंदगी की
उलझनों में
तब भी
कभी भी
तुमको
नहीं खलेगा
अकेलापन
तब
मैं हूंगी न
तुम्हारी
कुछ भी नहीं ...... निवेदिता 

15 टिप्‍पणियां:

  1. अरे आप तो सब कुछ हो.......
    :-)

    सस्नेह
    अनु

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  2. ये चाहतें भी न .....

    वाह क्या समपर्ण है :) :)

    मेरे दिमाग में आज डाउनलोड होते विचार

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  3. बहुत सुन्दर
    समर्पण भाव कि सुन्दर रचना...
    :-)

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार को (18-11-2013) कार्तिक महीने की आखिरी गुज़ारिश : चर्चामंच 1433 में "मयंक का कोना" पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. इन चाहतों को रोके रखना भी आसां नहीं होता ... छलक उठेंगी अपने आप ही ...

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  6. यही तो खासियत होती है "कुछ भी नहीं" की , कि सब कुछ होती है हमेशा :)

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  7. कुछ भी नहीं ??? अरे सब कुछ.... आपसे ज्यादा तो कुछ भी नहीं.... :)

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  8. देखिये जी , यहाँ इंकार में इकरार कैसे मुस्किया रहा है , अभिये तनी देर में हंसेगा भी .

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