मंगलवार, 19 मार्च 2013

विज्ञापन - अर्थ का अनर्थ



कभी आपने सोचा है कि वो कौन सी चीज है जो सुबह आँखे खुलने से लेकर एकदम बेसुध हो कर सो जाने तक भी आपका पीछा नहीं छोड़ती ..... नि:संदेह वो इकलौती चीज है विज्ञापन ! 

नींद खुलते ही निगाहें ,अपनेआप ही किसी ख़ास चेहरे की तलाश करती हैं ! जानते हैं क्यों , क्योंकि "उसका चेहरा हमारे लिए लकी है "..... याद आया न एक साबुन का विज्ञापन ! वैसे ये तो मैं भी करती हूँ । आँखें बंद किये हुए ही अपना सेलफोन खोजती हूँ कि पहली निगाह बच्चों की तस्वीर पर ही पड़े :)  दांतों को साफ़ करते समय भी आत्मविश्वास बढ़ता हुआ महसूस होता है , भई हमारी क्या गलती विज्ञापन तो यही कहता है । चाय बिस्किट से लेकर दाल - चावल - आटा - मीठा कुछ भी प्रयोग करें कोई न कोई विज्ञापन याद आ ही जाता है । अगर हमको न याद आये तो याद दिलानेवाले कहीं आस - पास से प्रकट हो ही जाते हैं ,आखिर समाजसेवा भी कोई चीज़ है ! पता चलता है बच्चों को बड़े ही प्यार से बोला "गुडनाईट" और जवाब मिलता है -"हाँ मम्मी लगा लिया । "

विज्ञापनों से अपनी कोई दुश्मनी नहीं है भई ,पर क्या करें कुछ विज्ञापन ऐसे होते हैं कि अर्थ का अनर्थ करते वाक्य ही याद आते हैं । ये विज्ञापन हमारे दैनंदिन की बोलचाल से चुराए हुए वाक्यों से बनते हैं । ऐसे ही कुछ विज्ञापन देखिये ....... वैसे आप चाहें तो आप भी कुछ विज्ञापन याद दिला सकतें हैं ....

१ - टेढ़ा है पर मेरा है । ( कुरकुरे )
       (बाकी सब तो ठीक है पर मेरा वाला ही टेढ़ा क्यों है )

२ - Little less is always better .( panasonic )
       (अगर बच्चे ने परीक्षाफल दिखाते हुए यही कह दिया तो ...)

३ - कौन  पहले बल्लेबाज़ी करेगा - उंगली घुमा के बोल ( सॉस )
      (रिश्वत की प्राथमिक पाठशाला )

४ - कीटाणु मारे सिर्फ दस सेकेण्ड में ( लाइफब्वाय )
      (दस सेकेण्ड में तो साबुन फ़ैल ही पायेगा फिर कीटाणु ...)

५ - डर के आगे जीत है ( शीतल पेय )
      (जीत तो बिना डरे भी मिल सकती है पर डर के अनर्थ भी हो सकता है ...)

६ - दिखावे पर न जाओ ,अपनी अक्ल लगाओ (
      (पर भैय्ये आप भी तो अपना प्रोडक्ट दिखा रहे हो ...)

७ - पच्चीस का हो गया हूँ ,अब नहीं तो कब पटाउंगा 
      (अभी तक तो मतदान की ही उम्र के बारे में सुना था ,ये पटाने की उम्र ..)

८ - मेरे बाल मेरे स्ट्रेस का पता नहीं चलने देते ( केयो - कार्पिन )  
      (चलो भई  ,एक विग खरीद लेते हैं )

               चलिए मिलते हैं कुछ और विज्ञापनों से ज्ञानार्जन करने के बाद ...... निवेदिता 



21 टिप्‍पणियां:

  1. क्‍या बात है .... बेहतरीन प्रस्‍तुति

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  2. सुंदर प्रस्तुति. विज्ञापनों ने तो "भेजे का कोर्मा बना दिया है"

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  3. विज्ञापन की दुनिया का अजूबा करिश्मा
    क्या उधेड़ा है
    बधाई

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  4. इसीलिए मैं कभी 'रोटोमैक पेन 'का इस्तेमाल नहीं करता ,कि कहीं लिखते लिखते लव न हो जाए ।

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    1. एक बार कर के देख ही लो भाई साहब ... यह दूसरे वाले लव का दाग लगा भी तो कह देना ... "दाग अच्छे है" ... ;)

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  5. खूब शोध किया है ... मान गए साहब !


    आज की ब्लॉग बुलेटिन होली तेरे रंग अनेक - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  6. आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (20-03-13) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

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  7. वाह बढ़िया है ...मज़ेदार पोस्ट :)

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  8. रोचक..मजेदार पर सन्देश साफ-साफ..

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  9. सच कहा है ... अर्थ का अनर्थ कर देते हैं कभी कभी ये विज्ञापन ...

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  10. हर बार तो दिमाग पक जाता है तो बन्द कर देते हैं, आज सच में अर्थ समझ आ रहा है।

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  11. आपकी यह रचना दिनांक 21.06.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in/
    पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

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