शुक्रवार, 8 मार्च 2013

अधिकार जलाने का .......

कुछ  दिनों पहले एक बुजुर्ग के देहांत पर उनके घर गयी थी । वहाँ का माहौल गरिमापूर्ण अवसाद का था । एक बुजुर्ग ,जो अपने समस्त दायित्वों को पूरा कर चुके थे ,अपनी अंतिम शय्या पर चिरविश्राम की मुद्रा में लेटे थे । पास ही उनकी बहू ,बेटी और पौत्रियाँ विषादग्रस्त बैठी थी ,बीच - बीच में क्रमानुसार जा कर विविध दायित्वों को पूरा कर रही थीं । मन बरबस ही "नम:शिवाय" का जाप करने लगा था । अचानक भुनभुनाहट जैसी ध्वनि उभरने लगीं कि संस्कार कौन करेगा ! किसी ने मुझसे भी ये सवाल पूछा , मैंने अनायास ही कह दिया जिन लोगों ने उनके अंत समय इतनी सेवा की है उन बहू-बेटियों को ही करना चाहिए । मेरा इतना कहना ही जैसे मधुमक्खियों को डंक मारने का स्वर्णिम अवसर दे गया । विभिन्न दावों और प्रतिदावों का निर्णय सुनाया गया कि जलाने का अधिकार तो बेटों का ही है ! मैं हतप्रभ रह गयी कि सेवा का अधिकार या कहूँ कर्तव्य सिर्फ बहू और बेटियों का है , उस समय बेटे नहीं याद आते !

वहाँ से वापस अपने घर आने के बाद भी इस "जलाने के अधिकार" पर ही सोचती रही । रह-रह कर ये सोच  
मन को खरोंचती रही कि हम अपने बेटों को सिर्फ अपनी चिता की आग की सेंक ही क्यों देते हैं ! अपने विचारों की सेंक से उनको क्यों अछूता रखते हैं ! हम विभिन्न बहाने बना कर ,कभी उनके कम उम्र होने का तो कभी उनकी अपनी व्यस्तताओं का ,उनको अपनी वेदनाओं से अलग रखने के लिया सतत प्रयत्नरत रहते हैं । इस क्रम में ही बेटे अपनी दुनिया में व्यस्त भी हो जाते हैं और मस्त भी । उनको अभिभावकों की याद उनकी मृत्यु होने पर ही आती है और चिता को अग्नि देने के अधिकार अथवा कर्तव्य जो भी कह लें ,को पूरा करने आ जाते हैं । 

इस प्रक्रिया में बेटे कोई गुनाह न करके भी गुनाहगार बन जाते हैं । मुझे शिकायत बेटों से नहीं है । आक्रोश तो समाज के ठेकेदारों से है , जो इस परम्परा का पालन करने में इतने अतिउत्साहित हो जाते हैं कि बेटियों की अनदेखी कर देते हैं । अग्नि देने के अधिकारी के रूप में तो कभी - कभी ऐसे लोगों को सामने खड़ा कर दिया जाता है ,जो इस व्यक्ति के जीतेजी ही उनकी मारने का प्रयास करते हैं । 

कभी-कभी लगता है कि अच्छा है ये जलाने का अधिकार बेटियों को नहीं मिला ,क्योकि वो तो जलाने के नाम पर चूल्हा ही अच्छे से जला पाएंगी क्योंकि अपनों को जला पाना सच में बेहद तकलीफदेह होता होगा ......
                                                                                                                  -निवेदिता 

16 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा आलेख!
    --
    आपकी पोस्ट के लिंक की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!

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    1. चर्चा - मंच में स्थान देने के लिए धन्यवाद !

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    2. गुरु जी बढ़िया चयन post का ,बहुत अच्छी रचना निवेदिता जी की और आपकी तो बूढी गजल का जवाब नहीं जी

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  2. बेहद प्रभाव साली

    आप मेरे भी ब्लॉग का अनुसरण करे

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में

    तुम मुझ पर ऐतबार करो ।

    .

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  3. ......... क्या कहें...
    ऐसा सोचकर ही दिल काँप उठता है... :(
    वैसे बात आपकी सही है!
    ~सादर!!!

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  4. मत छेडिए यह विषय..न जाने क्या क्या उबलने लगता है अंदर :(

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    1. सच कह रही हो ऐसी घटनाएँ अजीब सी घुटन और बहुत ही तीखी खौलन दे जाती हैं (

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  5. जो सबसे प्यारा हो उसे ही करने को कहा जाये यह कार्य।

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  6. मार्मिक..... जाने कब कुछ बदलेगा , कुछ बातें प्रश्न बनकर ही खड़ी है आजतक

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  7. ye icchha bhi marne wale se pahle hi poochh li jaye aur us se tark vitark kiya jaye ki seva kare koi aur jalaye koi...lekin ek tarah se acchha bhi hai ki agar beti bahu ko ye adhikar nahi hai.....nari jo sewa karna janti hai....vo itna kathor kary kyu kar kare....jaise janm dene wali nari maar nahi sakti...waise hi sewa karne wala jalaye kyu ?

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  8. ऊँगली पकड़ जिन्हें चलना सिखाया
    अंत में उन अपनों ने ही जलाया
    कैसा यह दस्तूर है भाया
    अपने मन को न यह भाया

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  9. इस परंपरा का आज के समय कोई औचित्य नहीं..जिसने जीवन में कोई उत्तरदायित्व नहीं निभाया, आख़िरी समय उसका अहसान क्यूँ? बेटियां भी यह उत्तरदायित्व निभा सकती हैं.

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