शनिवार, 7 जुलाई 2012

"गरजत बरसत सावन आयो रे"




अभी आँखों से नींद की खुमारी भी नहीं उतरी थी कि बहुत इंतज़ार कराने के बाद रिमझिम पड़ती फुहारों की बढ़ती तीव्रता ने एहसास दिला ही दिया कि "गरजत बरसत सावन आयो रे" .......... मिट्टी की सौंधी-सौंधी खुशबू अभी साँसों में बस भी न पायी थी कि इस वर्ष की पहली बरसात की पकौड़ियों के लिए लहराए जाने वाले इंकलाबी परचम की आहट भी मिल गयी ! एक सुगृहणी की तरह फरमाइश के पहले ही रसोई में पहुंच गयी पर ये क्या पकौड़े बनाने का उत्साह ठंडा पड़ता सा लगा बर्तनों का ढेर और फ़ैली हुई रसोई देख कर, काम वाली बाई अभी तक नहीं आयी थी ...... किसी प्रकार मनोबल बनाये रखते हुए खुद को एक दिलासा दिया कि थोड़ी देर में आ जायेगी तब तक पकौड़े तो बना ही लिए जायें | रसोई से फैलती तले जाते पकौड़ों की खुशबू बारिश का आनन्द लेते बाकी सदस्यों को आनन्दित कर रही थी साथ में आती फ़ूड -प्रोसेसर की आवाज़ चटनी के लिए भी आश्वस्त कर रही थी | 

बारिश की बूंदों और तेल में छनती पकौड़ियों की ताल से ताल मिला कुछ गुनगुनाने का प्रयास मोबाइल की पुकार से कंठ में ही अटक गया और भोलेबाबा को मनाने लगी कि ये पुकार महरी की न हो .......... पर लगता है भोलेबाबा किसी दूसरी दिशा के दौरे पर निकल गये थे ..( .....महरी की खनकती आवाज़ कह रही थी कि वो आज पहली बरसात की पहली छुट्टी लेगी ....अब क्या कर सकते थे , दूसरे दिन तो आ जाए इसलिए हमने भी दुगनी खनकती आवाज़ में कहा कोई बात नहीं कल आ जाना |

अब दुबारा भोले बाबा को पुकार कर पूछती हूँ कि सावन और महरी, इन दोनों को साथ-साथ भेज दें ...... चलिए तब तक आप भी पकौड़ों के साथ तीखी चटपटी चटनी का लुत्फ़ उठायें .......


17 टिप्‍पणियां:

  1. गरजत बरसत सावन में ही चाय पकौड़ी खाने में आनंद आता है,,,

    RECENT POST...: दोहे,,,,

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  2. घर घर की कहानी...........
    :-)
    भोले बाबा आपकी पुकार जल्द सुनेंगे.

    सस्नेह
    अनु

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    1. शुक्रिया अनु जी , भोलेबाबा ने पुकार सुन ली ...-:)

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  3. बरसात में पकौड़ो का मजा ही कुछ और होता है..

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  4. दो दो सुख एक साथ, ईश्वर से कुछ अधिक नहीं माँग रहीं हैं?

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  5. इस सच्चे संस्मरण में गृहणियों का दर्द छुपा है। अब तो पकौड़ी का ऑर्डर देने से पहले देखना होगा कि महरी आई है या नहीं।:)

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  6. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल रविवार को 08 -07-2012 को यहाँ भी है

    .... आज हलचल में .... आपातकालीन हलचल .

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  7. कहाँ है पकौड़े और चटपटी चटनी निवेदिता जी.
    आज तो हमारे यहाँ भी खूब झमाझम बरसात हुई है.
    सावन आ गया,महरी भी आ ही जायेगी.
    हाँ आप भी आ जाईये मेरे ब्लॉग पर तब तक.

    आपकी सुन्दर टिपण्णी ही मेरे लिए पकौड़े और
    चटपटी चटनी से कम नही.

    सच में बहुत दिन हो गए हैं चखे हुए.

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  8. saawan ki sondhi mahak ....pakaude ki khushboo ....waah ...!!aaj nashta yahi karenge ...

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  9. सावन आए तब भी ठीक पर महरी के बिना तो हाल बहुत गंभीर हैं उसे तो भेज ही दे|
    आशा

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  10. सभी जगह अब आया ही गया सवान मैंने भी इसी विषय में कुछ लिखा है समय मिले आपको तो ज़रूर आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है।

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  11. पहले पकौड़े खा लेते है..
    फिर महरी की चिंता करेंगे...
    :-)

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  12. ये शहरी जिंदगी भी जैसे महरी के इर्द गिर्द ही बची है.....पकोड़े की ख़ुशबू ने तृप्त किया।

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  13. महरी को बोलना था न, आ जाओ...चटनी के साथ पकौड़े खिलाऊँगी...साथ में चाय बोनस में...😊

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