शनिवार, 24 मार्च 2012

सुर कभी भी बेसुरे नहीं होते .....




सुर कभी भी बेसुरे नहीं होते
चाहत जिसे हो मन्द्र की
तार सप्तक के स्वर
शोर सा करते लगते हैं ....

जब आदत हो ऊँचे बोलों की
सरगोशियों में मध्यम सुर
अक्सर अनसुने रह जाते हैं ..

दोष कभी भी नहीं रहा
वीणा के ढीले पड़ते तारों का
पंखुड़ियों को तो बिखरना ही था
गुनाहगार बनी बलखाती पुरवाई ..
                                    -निवेदिता


23 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर निवेदिता बहन

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  2. हम सुर में सुने जा रहे है . सुरीला .

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  3. सच है, सबकी अपनी अलग चाहते हैं।

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  4. पंखुड़ियों को तो बिखरना ही था
    गुनाहगार बनी बलखाती पुरवाई

    बहुत खूब

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  5. पंखुड़ियों को तो बिखरना ही था
    गुनाहगार बनी बलखाती पुरवाई ..sahi

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  6. पंखुड़ियों को तो बिखरना ही था
    गुनाहगार बनी बलखाती पुरवाई ..

    ....सच कहा है...बहुत सुंदर...

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  7. सच है लय में हों तो तार सप्तक भी मज़ा देता है ...

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  8. क्या बात है. वास्तव में सुर कभी बेसुरे नहीं होते.

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  9. क्या बात है. वास्तव में सुर कभी बेसुरे नहीं होते.

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  10. खूबसूरत रचना.........................

    सादर.

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  11. सुर बेसुरे नहीं होते! सही ही लिखा। :)

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  12. कल 02/07/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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