शुक्रवार, 20 जून 2014

ख्वाहिश ....



ख्वाहिशों की भी 
कितनी तो किस्में हैं 
कुछ बेबसी में पैदा होती हैं 
और कुछ बेबसी को बेबस कर देती हैं !

ख्वाहिशों की भी 
अजीब सी ख्वाहिशें हैं 
बेसबब सी जो महसूस होती हैं 
अकसर वो ज़िंदगी का सबब होती हैं !

रूह में पैबस्त 
जब कोई ख्वाब होता है 
हज़ार ख्वाहिशों की सरगोशियों में 
धड़कती उम्मीदों का इक बायस होता है !
                           - निवेदिता 

14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (21-06-2014) को "ख्वाहिश .... रचना - रच ना" (चर्चा मंच 1650) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. वाह...बहुत सुन्दर
    सस्नेह
    अनु

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  3. रूह में पैबस्त
    जब कोई ख्वाब होता है
    हज़ार ख्वाहिशों की सरगोशियों में
    धड़कती उम्मीदों का इक बायस होता है !
    ...... सच कहा आपने..

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  4. ख्वाहिशे ज्यादा हैं पर बुरी नहीं , अच्छी बात हैं ! निवेदिता जी धन्यवाद !
    I.A.S.I.H - ( हिंदी में समस्त प्रकार की जानकारियाँ )

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  5. बहुत सुन्दर....ख्वाहिशें बड़ी अजीब चीज़ लगती है मुझे तो :)

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  6. हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
    बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले!
    /
    बहुत ख़ूबसूरत!

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