सोमवार, 2 जून 2014

बिखरे लम्हे ( १ )


ओस को हमने 
कभी बरसते देखा नहीं 
क्या फूल भी कभी
अपना दामन
अपने ही अश्रुओं से
भिगोते हैं !
       
रात के दामन में 
आसमान ने
टांके थे सितारे 
बरसती ओस ने 
धुंधली कर दी 
चमक सितारों की !

कोई लम्हा जैसे 
अनायास ही 
सोती आँखों से 
उनींदापन हटाने
चहलकदमी करता 
गुज़रा है यहाँ से !   

पलकें अपनी यूँ ही 
मुंदी हुई रहने दो  
बस इतनी सी तो है
उम्र ,उम्मीदों भरे
इन पलकों तले 
सांस भरते खवाबों की !
               ..... निवेदिता 



15 टिप्‍पणियां:

  1. गहरे एहसास भरे लफ्ज़ ... ख्वाब जीते भी रहते हैं खुली आँखों में कभी ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन चाहे कहीं भी तुम रहो; तुम को न भूल पाएंगे - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. शिवम भैया ,आभार कहने की होती है न :) ..... स्नेहाशीष !

      हटाएं
  3. बहुत सुन्दर...भावों को पूरी गहराई के साथ उतार दिया है अपने...|

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ख़ूब!! कुछ छोटी-मोटी कसर बाकी है, लेकिन चलेगा!!

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (03-06-2014) को "बैल बन गया मैं...." (चर्चा मंच 1632) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुंदर प्रस्तुति भावपूर्ण

    उत्तर देंहटाएं
  7. हर एक पंक्ति बहुत खूबसूरत है भाभी !! दो तीन बार कल पढ़ा था, आज सोचा कि आपको कहा है तो यहाँ सिर्फ कमेन्ट कर के जाऊँगा. दो बार देखिये आज भी पढ़ना पड़ा. यही खूबसूरती होती है आपकी कविताओं की

    उत्तर देंहटाएं
  8. सुन्दर भावों की कोमल सी कविता । खूबसूरत ।

    उत्तर देंहटाएं